मुंबई। वाहन उद्योग में मंदी का सबसे बड़ा कारण यूज्ड कार यानी सेकंड हैंड कारें हैं। भारतीय बाजार में सेकंड हैंड कारों का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है और इसकी वजह से नई कारों की बिक्री घटने लगी है। ब्लूमबर्ग के एक्सपर्ट की तो कम से कम यही राय है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में कहा था कि ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में मंदी ओला और उबर जैसे टैक्सी एग्रीगेटर कंपनियों की लोकप्रियता बढ़ने के कारण आई है।

युवा तबका मोबाइल एप पर उपलब्ध टैक्सी सेवाएं पसंद करता है। मारुति सुजुकी इंडिया जैसी कंपनियां सीतारमण की इस राय से इत्तेफाक नहीं रखती। अगस्त के दौरान नई कारों की बिक्री में 41 प्रतिशत की रिकॉर्ड गिरावट देखी गई।

सेकंड हैंड कारों की बढ़ी मांग

एडेलवाइस सिक्योरिटीज के विलेषक चिराग शाह का कहना है कि घरेलू बाजार में सेकंड हैंड कारों का कारोबार तेजी से बढ़ा है।

- 2012 में सेकंड हैंड कारों का बाजार नई कारों के मुकाबले 0.8 गुना बढ़ा था

- 2019 में मार्च तक नई कारों के मुकाबले 1.2 गुना बढ़ा पुरानी कारों का बाजार

- इस दौरान नई कारों की ग्रोथ 4 फीसदी रही, जबकि यूज्ड कारों की 11 प्रतिशत

बढ़ सकता है यूज्ड कारों का बाजार

एडेलवाइस सिक्योरिटीज के नोट में कहा गया है कि अर्थव्यवस्था में मंदी जैसे हालात, आय वृद्घि में सुस्ती और बचत घटने की वजह से नई कारों की बजाए यूज्ड कारों का बाजार और बढ़ सकता है। उनका कहना है कि पिछले सात वर्षों में यूज्ड कार सेग्मेंट में संगठित क्षेत्र की दिलचस्पी लगातार बढ़ी है। इससे सेकंड हैंड कारों के प्रति ग्राहकों का भरोसा बढ़ा है।

टैक्स घटने से भी बढ़े ग्राहक

सरकार ने इंजन की साइज के आधार पर सेकंड हैंड वाहनों पर टैक्स की दर 28 प्रतिशत से घटाकर 12-18 प्रतिशत कर दिया है। इसके कारण यह सेग्मेंट पहले से ज्यादा आकर्षक हो गया है। नोट में कहा गया है कि नियामकीय बदलावों के बाद कीमतों में अंतर भी बढ़ा है।

तेजी से बढ़ी बाजार हिस्सेदारी

- वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान सेकंड हैंड बाजार में 6-8 साल पुरानी कारों की हिस्सेदारी बढ़कर 28 फीसदी हो गई है, जो महज 2 साल पहले शून्य थी।

- करीब 50 फीसदी सेकंड हैंड कारों के खरीददार 25-34 साल उम्र के हैं। देश में कारों की सबसे ज्यादा मांग इसी उम्र के ग्राहकों से निकलती है।

- पिछले 3 साल के दौरान सेकंड हैंड कारों के लिए फाइनेंस की हिस्सेदारी 10 फीसदी से बढ़कर 17 फीसदी हो गई।

- रिप्लेसमेंट बॉयर्स वित्त वर्ष 2015-16 की तुलना में वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान बढ़कर दोगुने या करीब 16 फीसदी हो गए।