राजीव सिंह। देश के पांच राज्यों में हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों के परिणामों में विभिन्न वर्गों और समुदायों को लुभाने वाले वादों, घोषणाओं और नीतियों की अहमियत दिखाई दी है। इन नतीजों से साफ जाहिर होता है कि इन राज्यों में चुनावी घोषणा पत्र में शामिल कृषि कर्ज माफी जैसे लोकलुभावन वादे कांग्रेस की जीत में निर्णायक साबित हुए हैं। साफ संकेत है कि भाजपा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार की नीतियां मतदाताओं को आकर्षित नहीं कर रहीं। यदि भाजपा को केंद्र की सत्ता में फिर से आना है तो उसे लोकसभा के आम चुनाव से पहले लोकलुभावन नीतियों की ओर रुख करना पड़ेगा।

सरकार ने पिछले कुछ दिनों में अपनी कार्यशैली में जो बदलाव किया है उससे संकेत मिलने शुरू हो गए हैं कि भाजपा ने हिन्दी पट्टी में अपनी हार से सबक ले लिया है। अब वह अच्छी तरह से समझ गई है कि जनता उसी पार्टी को वोट देगी जो ज्यादा आकर्षक वादे करेगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि खेती की बढ़ती लागत और फसलों के वाजिब दाम न मिलने से किसान परेशान है। इस बात को सरकार अच्छी तरह से जानती है कि कृषि ऋण माफ करने से राजकोषीय घाटे पर सीधा प्रभाव पड़ेगा। ऐसे में एक और कृषि ऋण माफी की गुंजाइश काफी कम है। इस मुद्दे पर सामंजस्य बनाने के लिए केंद्र सरकार को रचनात्मक नीति अपनानी होगी।

सियासी संकेतों के मुताबिक, सरकार अपना वोट बैंक मजबूत करने के लिए किसानों को सीधे लाभ हस्तांतरण योजना शुरू कर सकती है। इसके तहत किसानों को 4000 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से ब्याजमुक्त फसली ऋण मुहैया कराया जाएगा। इस ऋण की प्रति किसान अधिकतम सीमा एक लाख रुपए होगी। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किसानों को राहत देने के लिए अन्य उपायों पर भी विचार कर रहे हैं।

रोजगार और कृषि क्षेत्र को बढ़ावा

सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग ग्रामीण प्रतिभाओं को बढ़ावा देने और रोजगार के अवसर मुहैया कराने के लिए ग्रामीण क्षेत्र के विकास पर विशेष जोर दे रहा है। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऋण माफी के कतई पक्ष में नहीं हैं क्योंकि यह संस्कृति जरूरतमंदों को नाकारा और मूल्यहीन बना रही है। दूसरे, ऋण माफी अलग-अलग राज्यों की वित्तीय सेहत को भी प्रभावित करती है।

इस परंपरा से कर्ज लेना और महंगा हो जाता है। इसके अलावा सरकार फसलों के लिए हाल में बढ़ाए गए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की फिर से समीक्षा कर सकती है। साथ ही फसल बीमा योजना को उपयोगी बनाकर किसानों का दिल जीता जा सकता है। इसके तहत बीमा प्रीमियम में कटौती, बीमा के दायरे में और फसलों को लाना एवं किराए पर खेती करने वाले किसानों को भी यह सुविधा मिले तो यह कदम राजग के केंद्र की सत्ता फिर से हासिल करने के लिए कारगर उपाय साबित हो सकते हैं।

कमजोर तबके को राहत

सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णो के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 10 फीसद आरक्षण का प्रावधान किया है। यह आरक्षण पहले से मौजूद 50 फीसद आरक्षण से ऊपर है। यह कदम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा के अनुरूप है। संघ का मानना है कि आरक्षण आर्थिक मापदंडों के आधार पर दिया जाना चाहिए न कि जाति के आधार पर। यह कदम आगामी चुनाव में सरकार के पक्ष में उत्प्रेरक का काम कर सकता है।

मध्यवर्ग पर भी ध्यान होगा

मौजूदा परिदृश्य में सरकार को मध्य वर्ग पर भी ध्यान देने की जरूरत है। यह वर्ग अर्थव्यवस्था में टैक्स के रूप में अहम योगदान करता है जिसे थोड़ी राहत के जरिए ही आकर्षित किया जा सकता है। सरकार के नोटबंदी और जीएसटी जैसे बड़े आर्थिक सुधारों से यही वर्ग ज्यादा प्रभावित हुआ था। इस वर्ग को अपने पक्ष में करने के लिए सरकार कई वस्तुओं पर जीएसटी की दरें घटा चुकी है। इस विश्वास को और मजबूत करने के लिए सरकार जल्द ही कुछ और पहल करेगी।

सबसे अहम बात यह है कि पेट्रोलिमय उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाया जाए तो इससे मध्यम वर्ग कम होगा। हालांकि इससे वित्तीय मोर्चे पर सरकार की मुश्किलें कई गुना बढ़ जाएंगी क्योंकि सरकार के खजाने में ईंधन की बिक्री से मिलने वाले करों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। लेकिन सरकार इन करों में कटौती करके मध्यम वर्ग को खुश कर सकती है। इसके साथ ही मौजूदा आयकर स्लेब में भी कुछ कटौती की जा सकती है। हालांकि सरकार के लिए यह कठिन निर्णय होगा फिर भी वह एक बड़े वर्ग को खुश करने के लिए इस दिशा में कदम उठा सकती है।

यद्यपि भाजपा को चुनाव में लगभग 300 सीटें हासिल करने का भरोसा है लेकिन इन दावों को पक्का करने के लिए कुछ लोकलुभावन उपाय करने ही होंगे, जिस तरह वर्ष 2014 के चुनाव से पहले किए थे। यदि सरकार राम मंदिर के मुद्दे पर साहसिक रुख अपनाती है तो वह विश्व हिन्दू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विश्वास को फिर से हासिल कर लेगी। लेकिन इस मुद्दे से भाजपा को कितना फायदा मिलेगा, अभी इसका आकलन कर पाना मुश्किल है।

बहरहाल, यदि सरकार इन लोकलुभावन उपायों पर अमल करती है तो वह मतदाताओं को आकर्षित करने में सफल हो सकती है। इसके लिए भाजपा को गहन मंथन के बाद सियासी समीकरण बनाने होंगे। इस पहल के जरिए हिन्दी पट्टी में नुकसान के बावजूद एनडीए सरकार के फिर से सत्ता हासिल करने की संभावना बन सकती है।

निवेशक इस तथ्य से भलीभांति वाकिफ हैं कि सरकार ने पिछले चार साल में अर्थव्यवस्था को राजनीति से ऊपर रखा है। वित्तीय प्रबंधन और आर्थिक वृद्धि के क्षेत्र में बढ़िया प्रदर्शन किया है। ऐसे में यदि भाजपा लोकलुभावन उपायों के साथ चुनावी समर में कूदती है तो यह कदम मतदाताओं को आकर्षित कर सकता है, लेकिन इससे सरकार का राजस्व स्थायी रूप से प्रभावित होगा।

(लेखक कार्वी स्टाक ब्रोकिंग के सीईओ हैं।)