माला दीक्षित, नई दिल्ली। वन धन योजना के जरिये आदिवासियों को सक्षम और संपन्न बनाने में जुटी सरकार बांस आधारित कमाई के मौके मुहैया कराकर उनकी माली हालत सुधारेगी। बांस से फर्नीचर और सौंदर्य प्रसाधनों के अलावा औषधीय महत्व में प्रयोग होने वाला चारकोल भी बनाया जाएगा।

यह चारकोल न सिर्फ सौ फीसद पर्यावरण अनुकूल है, बल्कि कार्बन डाई-ऑक्साइड को सोखकर प्रदूषण को कम करने की क्षमता भी रखता है। भारत सरकार का जनजातीय मंत्रालय कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (कॉप 14) में 13 सिंतबर को पर्यावरण अनुकूल बांस आधारित अर्थव्यवस्था की योजना पेश करेगा।

बांस आधारित कमाई का सबसे ज्यादा लाभ उन उत्तर पूर्वी राज्यों को मिलेगा जो विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों के कारण सामान्य योजनाओं और विकास का लाभ पाने में पीछे रह जाते हैं। उस आदिवासी बहुल क्षेत्र में बांस बहुतायत में होता है और उस पर आधारित अर्थव्यवस्था सीधे उनकी प्रगति के रास्ते खोलेगी।

पहले बांस को पेड़ की श्रेणी मे रखा गया था, जिसे काटने के लिए सरकार से इजाजत लेनी पड़ती थी। वर्ष 2017 में कानून में संशोधन करके बांस को पेड़ की जगह घास की कैटेगरी में रख दिया गया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि आदिवासी अपनी जमीन पर लगे बांस को काट के उपयोग कर सकते हैं। वहां दोबारा बांस का प्लांटेशन भी कर सकते हैं।

ऐसे होगा काम

- बांस आधारित कमाई से आदिवासियों को उद्यमी बनाने में जनजातीय मंत्रालय के तहत आने वाला टा्रइफेड मदद करेगा

- ट्राइफेड बांस के उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने और अच्छी कीमत दिलाने में आदिवासियों की मदद करेगा

- वन धन योजना के तहत स्वयं सहायता समूह चिन्हित किए जाएंगे, एक समूह को 15 लाख की मदद दी जाएगी