नई दिल्ली। इंटरनेट पर वाट्सएप और स्काइप जैसी ओवर-द-टॉप (ओटीटी) सेवाएं मुहैया कराने वाली कंपनियों को नियामकीय दायरे में लाने पर बना असमंजस फरवरी के अंत तक खत्म हो जाने की संभावना है। ऐसी उम्मीद की जा रही है कि भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) इस संबंध में अपने नियम फरवरी के अंत तक तय कर लेगा।

ट्राई के चेयरमैन आरएस शर्मा ने कहा, 'हम जल्द इस पर खुली बहस कराएंगे। हमें उम्मीद है कि अगले महीने के अंत तक हम अपनी सिफारिशें जारी कर देंगे।' टेलीकॉम कंपनियों की ही तरह गूगल ड्युओ, फेसबुक, वाट्सएप और स्काइप जैसी इंटरनेट से चलने वाली सेवाएं भी कॉलिंग और मेसेजिंग की सुविधा दे रही हैं। यही वजह है कि पिछले साल नवंबर में ट्राई ने इन सेवाओं को नियामकीय ढांचे के तहत लाने पर विचार-विमर्श किया था। टेलीकॉम कंपनियां लंबे समय से इन एप और ओटीटी सेवाओं को नियामकीय ढांचे के दायरे में लाने को लेकर बातचीत कर रही हैं।

ट्राई ने इस संबंध में आम लोगों से भी राय मांगी है कि क्या इन पर भी वैसे ही नियम लागू किए जाने चाहिए, जो दूरसंचार कंपनियों पर लागू किए गए हैं। असमान नियमों का आरोप वाट्सएप और फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म पहले ही निजी सूचनाओं की चोरी और फर्जी खबरों को लेकर नीति निर्माताओं की नजर में हैं। किसी भी तरह का नया नियामकीय ढांचा या लाइसेंस की जरूरत ऐसे एप्स पर और दबाव बनाएंगी।

टेलीकॉम कंपनियों के संघ सीओएआइ के अनुसार टेलीकॉम कंपनियां लाइसेंस शुल्क, स्पेक्ट्रम, दूरसंचार उपकरण और सुरक्षा उपकरणों पर बड़ी मात्रा में निवेश करती हैं। साथ ही उन पर भारी-भरकम टैक्स भी लगता है। इसके उलट ये ओटीटी एप बिना किसी नियामकीय लागत के दूरसंचार कंपनियों की तरह ही वायस-वीडियो कॉल और डाटा सेवाएं मुहैया कराती हैं।

इससे टेलीकॉम कंपनियों का कारोबार सीधे तौर पर प्रभावित होता है। ट्राई को लिखे पत्र में सीओएआई ने इन सेवाओं को लाइसेंसिंग व्यवस्था के दायरे में लाने की सिफारिश की है। दूसरी तरफ इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आइएएमएआइ)) और ब्रॉडबैंड इंडिया फोरम ने ओटीटी सेवाओं को लाइसेंस या नियामकीय ढांचे के तहत लाए जाने का विरोध किया है।

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