Ambikapur News : अंबिकापुर। पश्चाताप की आग में निखरी कला से जीवन में बदलाव का प्रत्यक्ष उदाहरण बन गया है लखनपुर विकासखंड के ग्राम हंसडा़ंड का सूरज प्रसाद निषाद। जाने अनजाने जीवन में आए कठिन दौर से न सिर्फ उसका मनोभाव बदला बल्कि गांव में कुटीर उद्योग की तर्ज पर लकड़ी के फर्नीचर बना 17 अन्य परिवारों में आई खुशहाली का माध्यम भी बन गया है। आजादी के बाद हर हाथ को काम का जो सपना देखा जा रहा है, उसमें सूरज प्रसाद भी सहभागी बन चुका है।

अंबिकापुर-बिलासपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर लखनपुर से थोड़ा आगे मुख्यमार्ग पर स्थित हंसडांड़ से एक सड़क बस्ती की ओर जाती है। इसी सड़क पर थोड़ा आगे बढ़ने पर एक घर में कुछ लोग लकड़ी पर कारीगरी करते नजर आते है। यह कोई कारखाना नहीं गांव के लोगों की आगे बढ़ने की सोच का परिचायक है। इसका सूत्रधार हंसडांड़ का सूरज प्रसाद निषाद है। जाने अनजाने जीवन मे हुए एक घटनाक्रम की वजह से सूरज प्रसाद को जेल जाना पड़ा था। लगभग आठ वषोर् तक वह जेल में रहा।

उस दौरान जेल के काष्ठ कारखाना को देखकर उसका भी मन लकड़ी के फर्नीचर और दूसरे सामान बनाने में लग गया, उसके अंदर पश्चाताप की आग भी थी, इसी तपिश में उसने अपनी कला को इतना निखारा कि आज वह लकड़ी से हूबहू किसी भी व्यक्ति की मूर्ति बना सकता है, सिर्फ चेहरा का हिस्सा सही तरीके से नहीं बन पाता। काष्ठ कला में पूरी तरीके से पारंगत सूरज प्रसाद 2007 में बाइज्जत बरी होने पर जेल से रिहा हुआ, उसके बाद उसने वापस मुड़कर नहीं देखा। आज उत्तरी छत्तीसगढ़ के लगभग सभी जिलों में लकड़ी के फर्नीचर बनाकर उपलब्ध कराने वालों में शामिल हो चुका है।

पारिश्रमिक राशि से खरीदा औजार

पुरानी बातों को पूरी तरीके से भूल चुके सूरज प्रसाद निषाद ने बताया कि जेल में उसने मेहनत की थी। जब वह बाहर निकला तो जेल प्रशासन द्वारा पारिश्रमिक के रूप में उसे लगभग 22000 रुपये दिए गए थे। इस राशि से उसने कोई दूसरा काम नहीं किया। जीवन में आगे बढ़ने तथा दूसरों के सामने अपनी अलग छवि बनाने की मंशा से उसने जेल से मिले पारिश्रमिक रकम से सारे औजार खरीद लिए। घर पर ही बैठ कर वह लकड़ी के सामान बनाने लगा। पारंगत होने के कारण उसके द्वारा निर्मित लकड़ी के सामान लोगों को पसंद आने लगे और आज वह सूरज मिस्त्री के नाम पर समूचे क्षेत्र में मशहूर हो चुका है।

17 व्यक्तियों को बना चुका है पारंगत

जेल से सीखी कला को स्वयं तक सीमित नहीं रखने के संकल्प के साथ सूरज प्रसाद ने गांव के ही लोगों को काष्ठ कला में पारंगत बनाने का काम शुरू कर दिया है। आज की स्थिति में सूरज प्रसाद के साथ गांव के ही 17 लोग भी काम करते हैं। यह लोग लकड़ी के फर्नीचर और दूसरे सामान बनाने में अभी पूरी तरीके से हुनरमंद तो नहीं हुए हैं, लेकिन सूरज प्रसाद के साथ इन्होंने काम करना शुरू कर दिया है। इन सभी लोगों को भी गांव में ही रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने का काम सूरज प्रसाद ने किया है। पसीने की कमाई से उसने एक पिकअप भी खरीद लिया है जो उसके रोजगार के अवसर को बढ़ाने में मददगार साबित हो रहा है।

लकड़ियों को मनचाहा स्वरूप देने में हुनरमंद

सूरज प्रसाद ने बताया कि वह पेंड्रा, बिलासपुर और तखतपुर के मिलों से लकड़ी खरीद कर लाता है। वहां उसे कम दाम पर बेहतर क्वालिटी की लकड़ी मिल जाती है। कम दाम में बेहतर क्वालिटी की लकड़ी मिलने से वह सरगुजा, सूरजपुर और बलरामपुर जिले में लोगों की मांग के अनुरूप कम दाम में ही फर्नीचर के सारे आइटम उपलब्ध करा पाता है। सूरज का कहना है कि लकड़ी का कोई भी सामान वह बना सकता है। आदमी भी बनाकर तैयार कर देगा सिर्फ चेहरा थोड़ा अलग हो जाता है।

हर हाथ को काम का सपना देखा

जेल से छूटने के बाद सूरज प्रसाद का मनोभाव पूरी तरीके से बदल चुका है। पिछली बातों को वह याद भी नहीं करना चाहता। उसने सिर्फ स्वयं की चिंता नहीं की। उसके साथ काम करने वाले 17 लोगों की चिंता भी वह हमेशा करता है। गांव-गांव में छोटे-छोटे उद्योग धंधे स्थापित कर लोगों के जीवन में समृद्धि खुशहाली का आजाद भारत में जो सपना देखा गया है, उसे पूरा करने में सूरज प्रसाद सहभागी बन चुका है। उसका कहना है कि हममें जो कला है, वह यदि दूसरों को आगे बढ़ाने में मदद करें तो उस कला में दूसरों को पारंगत करना हम सबका कर्तव्य भी है।

मुझे बेहद खुशी है कि जेल से बाहर निकलने के बाद कोई न सिर्फ अपने पैरों पर खड़ा हुआ बल्कि दूसरों को भी रोजगार उपलब्ध कराई। जेल में कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किया जा रहा है। इसका मूल उद्देश्य भी यही है कि कोई भी जब जेल से बाहर निकले तो कला कौशल से परिपूर्ण होकर नए सिरे से अपनी खुशहाल जिंदगी शुरू करे। सूरज प्रसाद निषाद की तरह कई और लोग जेल से बाहर निकलने के बाद पूरे स्वाभिमान और आत्मसम्मान के साथ मेहनत से नई जिंदगी गुजार रहे हैं।

- राजेंद्र गायकवाड, जेल अधीक्षक, अंबिकापुर

Posted By: Nai Dunia News Network

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