Chhattisgarh News : मनेन्द्रगढ़। क्षेत्र के वनांचलों में प्राचीन काल के देवी-देवताओं की मूर्तियों के साथ उनके कई अवशेष बिखरे पड़े हैं। जिन्हें सहेजने में पुरातत्व विभाग कोई रुचि नहीं दिखा रहा है। यही वजह है कि जिन पत्थरों को संग्रहालयों में होना चाहिए, वे पत्थर ग्रामीण खोद-खोद कर अपने कुओं में लगा रहे हैं।

मनेन्द्रगढ़ मरवाही मार्ग पर लगभग एक किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत भौंता के आश्रित छिपछिपी गांव में पुरातात्विक विरासत बिखरी पड़ी है। यहां सैकड़ों वर्ष पुरानी भगवान विष्णु की विहंगम प्रतिमा देखकर सहजता से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां कितनी प्राचीन विरासत और संस्कृति छिपी हुई है। जिस स्थान पर भगवान विष्णु की अत्यंत दुर्लभ प्राचीन प्रतिमा रखी हुई है, उसके आसपास काफी संख्या में अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के अवशेष बिखरे पड़े हैं।

एक हजार वर्ष पुरानी है मूर्ति

चंदेल राजाओं के जमाने में भगवान विष्णु का पूजन आरंभ हुआ था। खासकर चंद्रगुप्त मौर्य के जमाने से ही भगवान विष्णु की पूजा आरंभ हो गई थी। इस गांव के मूर्तिपारा में भगवान की जो मूर्ति मिली है, वह लगभग एक हजार वर्ष पुरानी मूर्ति है। इसके अलावा भी कई मूर्तियां व पुराने जमाने के बर्तन भी खोदने पर मिले हैं। साथ ही एक सीढ़ी भी बनी हुई है, जो सुरंगनुमा नीचे की ओर जाती है। जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि यदि उसकी खुदाई कराई जाये तो कोई तहखाना भी मिल सकता है।

पत्थरों को ले गये गांव के लोग

छिपछिपी गांव के जिस स्थान पर ये मूर्तियां प्राप्त हुई हैं, उसे मूरतपारा के नाम से जाना जाता है। इस संबंध में महामाया मंदिर के पुजारी ने बताया कि वे जब से जानते हैं तब से ये मूर्तियां यूं ही रखी हुई हैं। इनके संरक्षण का कोई प्रयास नहीं किया गया। यही वजह है कि जिस स्थान से इस तरह की और मूर्तियां निकली, वहां के न-ाशीदार पत्थरों को गांव के कई लोग उठाकर ले गए।

दुर्लभ है दशावतार प्रतिमा

ग्रामीणजनों के मुताबिक यहां सुखराम बाबा नामक संत आए थे और उन्होंने हसदेव नदी के किनारे ऊंचाई पर एक ध्वज गाड़ा था, जो आज तक स्थापित है। उन्होंने दुर्गम जंगल के अंदर एक दीमक की बामी देखी और जब उसे खोदकर देखा तो उसके अंदर भगवान विष्णु की दशावतार वाली दुर्लभ प्रतिमा निकली। इसके साथ ही साथ आसपास अन्य कई देवी-देवताओं की मूर्तियॉ निकली।

खुले में पड़ी हैं बेशकीमती मूर्तियॉ

इन सभी मूर्तियों को ग्रामीणों द्वारा एकत्रित कर वृक्षों के समूह के नीचे रखा गया है। खुले में रखी ये मूर्तियां धीरे-धीरे खराब होती जा रही हैं, लेकिन पता नही क्यों इनके संरक्षण की दिशा में कोई पहल नहीं की गई। ग्रामीण बतातें हैं कि इसी तरह महामाया मंदिर में भी क्षेत्र में निकली दुर्लभ मूर्तियों को रखकर उनकी पूजा की जाती है। इस गांव का इतिहास भी काफी पुराना है। यहां कई स्थानों पर मूर्तियॉ, प्राचीन भवन, प्राचीन गुफाएं, प्राचीन मीनारें छिपी हुई हैं।

Posted By: Nai Dunia News Network

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