अंबिकापुर। Native Herbs: मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत गुणकारी, किसानों की बाड़ी में अपने आप खरपतवार की तरह उगने वाले कचरी जिसे आम बोलचाल की भाषा में पेंहटा भी कहा जाता है। इसकी मांग और दाम सुनकर हर कोई दंग रह जाता है।उत्तरी छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में हर वर्ष इस सीजन में लगभग सात टन कचरी का व्यापार होता है। स्थानीय व्यापारी इसे छत्तीसगढ़ के साथ बिहार के पटना, गया, औरंगाबाद में भेजते हैं और भारी भरकम आर्थिक आय अर्जित करते हैं। थोक बाजार में वर्षभर भर कचरी की कीमत 200 प्रति किलो व फुटकर बाजार में 600 से हजार रुपए प्रति किलो तक पहुंच जाती है। स्थानीय लोग इसके फल को महज दस से 20 रुपये प्रति किलो बिक्री करते हैं।

जानकर कोई भी हैरान हो सकता है कि पेंहटा स्वयं उगने वाला एक

खरपतवार है, इसकी खेती नहीं की जाती।यह फल की तरह, सब्जी की तरह, कच्चा, पक्का और सुखाकर हर प्रकार से खाया जाता है। इसकी सब्जी मिर्च या आलू इत्यादि का मिश्रण कर बनाने की परिपाटी भी है। जब यह फल कच्चे होते हैं, तो हरे एवं सफेद रंग लिए हुए चितकबरे प्रतीत होते हैं व काफी कड़वे होते हैं। पकने पर पीले हो जाते हैं। इसे उगाया नहीं जाता है, इसकी बेल वर्षा ऋतु में विशेष रूप से खरीफ की फसल के समय खेतों में स्वतः ही उत्पन्न हो जाती है। सितम्बर तथा अक्टूबर के महीनों में यह सरगुजा क्षेत्र में ज्यादा होता है। इस समय गांव-गांव में इसे महिलाएं एकत्र कर रहीं हैं। काटकर सुखाया जा रहा है ताकि मुंहमांगे दाम पर बिक्री कर सके। अंबिकापुर बाजार में इस समय यह पेंहटा हजार रुपये किलो मिल रहा है।

झारखंड-बिहार में है इसका खास महत्व

कचरी जिसे झारखंड व बिहार के साथ उत्तरी छत्तीसगढ़ यानी सरगुजा संभाग में लोग पेंहटा के नाम से ही जानते हैं। इसका खास महत्व है। प्रसव के बाद महिलाओं को इसे खिलाया जाता है। शादी-विवाह में मेहमानों को पेंहटा नहीं दिया गया गया ति खूब किरकिरी होती है। खासकर मंडप के दिन मेहमानों की थाली में पेंहटा अवश्य परोसी जाती है।

किसानों का बड़ा साथी है पेंहटा

कृषि विज्ञान केंद्र मैनपाट के प्रभारी कृषि विज्ञानी डॉ संदीप शर्मा बताते हैं- कचरी में अनेक औषधीय गुण होते हैं। आयुर्वेदीय शास्त्रों ने इसे कर्कटी वर्ग की वनौषधि माना है।कुकुर बिटेसी कुल का पौधा है।आयुर्वेदीय ग्रंथों के अनुसार कचरी की बेल खीरे जैसी होती है, किन्तु उससे लम्बाई में कुछ छोटी होती है। इसके पत्ते छोटे तथा चार इंच तक लम्बे तथा छह इंच तक चौड़े, नरम तथा कोमल होते हैं। आकार में बिलकुल ककड़ी के पत्तों जैसे ही होते हैं। कचरी की बेल में छोटे-छोटे पीले रंग के खूबसूरत फूल लगते हैं। भाद्रपद मास में छोटे-छोटे लंबे-गोल फल लगने लगते हैं।यही फल पेंहटा कहलाता हैं। इसे आयुर्वेद में मृगाक्षी कहा जाता है। यह बिगड़े हुए जुकाम, पित्‍त, कफ, कब्‍ज, परमेह सहित कई रोगों में बेहतरीन दवा मानी गई है।

हर मर्ज की दवा है पेंहटा

आयुर्वेदाचार्य डॉ डीके सिंह बताते हैं यह गर्म और खुश्क होती है। यह मीठी, हल्की तथा आमाशय को मृदु बनाने वाली,भूख बढ़ाने वाली, कामोद्दीपक तथा बवासीर, लकवा, वात-कफ रोगों में आराम देती है। इसमें सुगंध होती है, इसलिए यह दिल व दिमाग को ताकत देती है। वायु रोगों में इसका सेवन ‘सोंठ’ के साथ कराया जाता हैं। भोजन पचाने व भूख बढ़ाने वाले चूर्ण में भी इसे मिलाया जाता हैं। इसके सेवन करने के बाद पेशाब खुलकर आता है। गरम तासीर वालों को इसका अधिक सेवन नहीं करना चाहिए अन्यथा बेचैनी, सिरदर्द, दस्त, बुखार हो सकते हैं। इसे दाल में भी डालने का प्रचलन है। इससे गैस के रोगियों को भी लाभ होता है। बवासीर में इसकी धूनी देना बहुत लाभदायक होता हैं। इसकी जड़ में ‘पथरी’ नष्ट करने की क्षमता होती है।

Posted By: Himanshu Sharma

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