दल्लीराजहरा (नईदुनिया न्यूज)। देवउठनी एकादशी बुधवार (आज) है। इस पर्व का महत्व दीपावली से कम नहीं होता है। इसलिए इस त्योहार को छोटी दिवाली भी कहा जाता है। इसे प्रबोधिनी एकादशी और जेठानी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पुराणों में ऐसा वर्णन मिलता है कि इसी दिन समुद्र मंथन के दौरान समस्त विश्व में पाए जाने वाले चौदह अनमोल रत्नों की प्राप्ति भी हुई थी।

शुभ कार्यों का होगा श्रीगणेश

देवों की निद्रावस्था एकादशी से भगवान छह महीने शयन शैय्या में रहते हैं। जिसके कारण कोई भी शुभ कार्य इस अवस्था में नहीं होता है। देवउठनी एकादशी के दिन भगवान के जागने के बाद इस दिन से सभी शुभ कार्य किए जाते हैं।

घर आंगन की लिपाई कर सजायी जाएगी रंगोली

शाम होने के पहले घर-आंगन की लिपाई कर चौक-रंगोली बनायी जाती है, तुलसी चौरा के सामने भगवान विष्णु की मूर्ति रखकर गन्नो का मंडप बनाया जाता है और डहरी घर की चौखट के चारों ओर दीप जलाकर अमरूद, कांदा, बेर, चनाभाजी, सिंघाड़ा और नारियल आदि फल रखकर धूप-दीप जलाकर तुलसी विवाह संपन्ना कराया जाता है।

अब शुरू होगा मेला मड़ई का दौर

वैसे माह में दो बार एकादशी आती है। दोनों ही एकादशी को पुण्य माना गया है। वर्ष में किसी भी एकादशी से प्रारंभ कर एक वर्ष व्रत रखने की परंपरा है। इस पर्व के साथ ही मेला-मड़ई का उल्लास भी शुरू हो जाता है, जो फागुन मास तक चलता है।

भगवान विष्णु को दिया था श्राप

शास्त्रानुसार एक बार राजा जालंधर की पत्नी की भगवान विष्णु ने परीक्षा ली। राजा राक्षसी प्रवृत्ति का था, लेकिन उसकी पत्नि पतिव्रता थी। भगवान विष्णु राजा जालंधर का रूप धरकर उसकी पत्नी के पास गए, वह भगवान को नहीं पहचान पाई और उसका सतीत्व भंग हो गया। वास्तविकता पता चलने पर रानी ने भगवान विष्णु को श्राप दिया, जिससे वह पत्थर बन गए। विष्णुजी को श्राप से मुक्ति के लिए तुलसी के साथ अगले जन्म में विवाह करने का वरदान मिला। अतः देवउठनी एकदशी के दिन माता तुलसी का विवाह भगवान विष्णु के साथ होने के कारण इस दिन को तुलसी विवाह के नाम से भी जाना जाता है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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