दलजीत सिंह चावला, बलौदा बाजार। Jhiram Valley Massacre : आज 25 मई को समूचे छत्तीसगढ़ में झीरम श्रद्धांजलि दिवस मनाया जा रहा है। एक ऐसे दर्दनाक घटना को याद करके समूचा प्रदेश श्रद्धासुमन अर्पित कर रहा है, जिसमें कांग्रेस ने प्रदेश के शीर्ष नेताओं को खो दिया था। नईदुनिया प्रतिनिधि ने झीरम घाटी कांड में गंभीर रूप से घायल हुए और पूरे मामले के प्रत्यक्षदर्शी साक्षी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता प्रवक्ता सुरेंद्र शर्मा से बातचीत की। उल्लेखनीय है कि शर्मा बलौदाबाजार के निवासी हैं और झीरम घाटी घटना वाले दिन तत्कालीन छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल के साथ ही थे। आज उन्होंने अपने अतीत की यादों के पन्नों को पलटते हुए इस दर्दनाक हादसे के अनुभव को साझा किया।

सवाल- झीरमघाटी में क्या कुछ हुआ था, आपके अनुभव कैसे रहे?

जवाब-आज सात साल पूरे हो गए। मैंने हर साल इसके विभिन्न पहलुओं पर लिखा। आज उस पहलू पर एकबार फिर से कह रहा हूं, जो नितांत निजी है। या हो सकता है मृत्यु के सामने खड़े हर आदमी की गाथा हो। उस दिन हम लोगों ने दो घंटा तक मृत्यु के साथ गुजारे थे। यह तय हो चुका था कि किसी भी क्षण एक गोली आएगी और हमारे जीवन का अंत हो जाएगा। जब मुझे लगा कि बच पाना सम्भव नही है तो अंर्तमन में एक अजीब सी शांति उतर आई। आरंभिक अवस्था मे ईश्वर से प्रार्थना चलती रही कि हे भगवान अब तुम्हीं रक्षा कर सकते हो। किन्तु कई लोगो को मरते देखकर अनजाने की मौत को स्वीकारने की तैयारी होने लगी। पत्नी ,बच्चे,मां भाइयों के चेहरे सामने आने लगे। निकटतम मित्रों का चेहरा भी नजरों के सामने दिखने लगा। मन जैसे उनसे विदाई मांगने लग गया था।

सवाल- गोलियां चलने के बीच घायल पड़े थे, तब मन में किस तरह के विचार आ रहे थे?

जवाब-पुत्र संकेत का विवाह नही हुआ था, मुझे लगा पत्नी कैसे सबकुछ कर पायेगी। फिर लगा हमारे पिता भी तो जल्दी चले गए हैं। थोड़ा रोने धोने के बाद जिंदगी अपनी रफ्तार पकड़ लेती है। जिंदगी की भूलें याद आने लगी जो स्वजन परलोकवासी हो चुके हैं उनसे जैसे वार्तालाप होने लगी। ऐसा लग रहा था कि उनसे जल्दी मुलाकात होगी। उन क्षणों में हृदय मित्रता-शत्रुता छोड़ चुका था। लगा जीवन का अंत सामने है अब किसी से क्या दुश्मनी। किसी मन के कोने से उन लोगों से क्षमा याचना का स्वर खुदबखुद निकलने लगा कि अब जा रहे हैं, माफ कर देना।

सवाल- इस घटना के बाद आज आप जीवित हैं, तब कैसा अनुभव करते हैं?

जवाब- घटना घटी और कुछ समय तक भयभीत और भारी मन एक अजीब शांति के संसार में विचरण करने लगा। जो ज्ञान सिर्फ कानों तक रहते हैं वह कब हृदय में उतर गया, कह नहीं सकता। मेरा ऐसा मानना है कि एक बार जान बच जाने के बाद आदमी फिर वैसा ही हो जाता है, जैसा उसका संस्कार है। स्वार्थी, षडयंत्रकारी, अवसरवादी और सदा जीवित रहने के दम्भ से भरा हुआ। आज हम जीवित हैं मगर वास्तविक जीवन तो वही था। जो जीवन और मृत्यु के बीच मे था। अगाध शांति से परिपूर्ण सबके प्रति सदीक्षा रखने वाला,सभी के प्रति कृतज्ञ और इस अनुभूति से गुजरता हुआ कि हम तो सिर्फ खिलौना है। हमें खेलता कोई और है और उसके खेल अद्भुत आश्चर्य जनक है। हमारे समझ और पहुंच से बाहर।

Posted By: Anandram Sahu

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