बलौदाबाजर। बलौदाबाजार के वैष्णव कालौनी में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के चौथे दिन बुधवार को भगवान नारायण के वामन अवतार और समुंद्र मंथन कथा का वर्णन किया गया। जिसमें श्रोता भाव विभोर होकर कथा का आनंद लेते रहे।

भागवताचार्य पंडित विष्णुधर दीवान ने बताया कि समुद्रमंथन में सबसे पहले हलाहल विष निकला और अंत में अमृत। संकेत है कि हर कार्य में अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति से पहले प्रारंभ में असफलता का विष ही मिलता है। यदि व्यक्ति इससे विचलित न होकर अपने प्रयत्न जारी रखे तो अपेक्षित लक्ष्य से पहले छोटी सफलताओं के रत्न सहज ही मिलने लगते हैं। इसी अर्थ में विष के बाद क्रमशः कामधेनु, उच्चैःश्रवा अश्व, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष और अप्सराएं निकलीं। ये प्रतीक है कि जल ही समस्त कामनाओं की पूर्ति करता है। कामधेनु और कल्पवृक्ष इसी के उदाहरण हैं। जीवन की गति और जीवन का वैभव भी जल से है। अश्व और गज का प्राकट्य इसी के प्रतीक हैं। अप् अर्थात जल के रस से निर्मित होने के कारण ही अप्सराओं का सौंदर्य अनुपम है। इसलिए कि जल से ही जगत की सुंदरता है। मणि जल के रत्नदाता होने की प्रतीक है। इसीलिए सागर का एक नाम रत्नाकर है। रात्रि में प्रकाश का दाता चंद्रमा और जीवन पोषक व रक्षक अन्ना व औषधियां भी जल से ही प्रकटी हैं क्योंकि जल से ही जगत का उजाला और पुष्टि-तुष्टि संभव है। जल ही धन है इसीलिए धन की देवी लक्ष्मी का उद्भव जल से हुआ है।

यूं हुआ था श्रीलक्ष्मी का अभिनंदन : कथा कहती है कि अप्सराओं के बाद शोभा की मूर्ति स्वयं भगवती लक्ष्मी देवी प्रकट हुईं। वे भगवान की नित्यशक्ति हैं। उनकी बिजली के समान चमकीली छटा से दिशाएं जगमगा उठीं। उनके सौंदर्य, औदार्य, यौवन, रूप-रंग और महिमा से सबका चित्त खिंच गया। देवताओं, असुरों, मनुष्यों सभी ने ये कामना की लक्ष्मी देवी हमें मिल जाएं। देवराज इंद्र अपने हाथों उनके बैठने के लिए आसन ले आए। श्रेष्ठ नदियों ने मूर्तिमान होकर उनके अभिषेक के लिए स्वर्ण कलशों में पवित्र जल लाकर प्रस्तुत किया। पृथ्वी ने अभिषेक के लिए योग्य औषधियां अर्पित कीं। गायों ने पंचगव्य और वसंत ऋतु ने चैत्र-वैशाख में होने वाले सब फूल व फल उपस्थित कर दिए। इन सामग्रियों से ऋषियों ने विधिपूर्वक मंगलमूर्ति महालक्ष्मी का अभिषेक किया। उस घड़ी गंधर्वों ने मंगलमय संगीत की तान छेड़ दी। बादल सदेह होकर मृदंग, डमरू, ढोल, नगाड़े, नरसिंगे, शंख, वेणु और वीणाएं बजाने लगे। तब लक्ष्मी देवी हाथ में कमल लेकर सिंहासन पर विराजमान हो गईं। इस अभिनंदन के उपरांत लक्ष्मी देवी हाथों में कमल पुष्पों की माला लिए सुपात्र का वरण करने को उठीं। उस माला के चारों ओर उसकी सुगंध से मतवाले भौरे गुंजार कर रहे थे। उस समय लक्ष्मीजी के मुख की शोभा अवर्णनीय थी। कुछ लज्जा के साथ वे मंद-मंद मुस्करा रही थीं। देवी की कामना सुपात्र पुरुष का वरण करने की थी किंतु गंधर्व, यक्ष, असुर, सिद्घ, चारण और देवताओं में उन्हें खोजने पर भी योग्य वर न मिल सका। तब देवी मन ही मन विचार करने लगीं कि यहां कोई तपस्वी तो हैं परंतु उन्होंने क्रोध पर विजय नहीं प्राप्त की है। किसी में ज्ञान है मगर वह अनासक्त नहीं है। कुछ महत्वशाली हैं किंतु वे काम को नहीं जीत सके हैं। इस प्रकार चिंतन करते हुए अंत में लक्ष्मी देवी ने समस्त सद्गुणों की खान भगवान विष्णु का चयन किया।

Posted By: Nai Dunia News Network

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