बालोद (नईदुनिया न्यूज)। इन दिनों जिले के सड़कों पर चार पहिया वाहन फर्राटे दौड़ते नजर आ रहे हैं। नियमों का उल्लंघन करते हुए दौड़ा रहे हैं, जिससे मार्ग पर चलने वाले लोग खतरा महसूस कर रहे हैं।

राहगीरों से मिली जानकारी के अनुसार दल्ली से माल भर कर भिलाई माइंस में जाने वाले मालवाहक ट्रक की स्पीड 70-80 से ज्यादा रहती है जबकि नियमतः 60 से ज्यादा ट्रकों की स्पीड नहीं होनी चाहिए। नियम के तहत ट्रकों व बसों में इंजन कटआउट लगवाना जरूरी है। वहीं ग्राम उमरादहा के ग्रामीण से मिली जानकारी के अनुसार भिलाई से माल खाली कर वापस आ रहा तेज रफ्तार ट्रक रोड किनारे बने कई गरीबों के आशियाने उजाड़ चुके हैं और ट्रकों द्वारा मार्ग पर मवेशियों को रौदने का खेल आए दिन चलता रहता है। यदि इन ट्रकों पर विभाग द्वारा लगाम नहीं लगाई तो इसानों के साथ बड़ी घटना होने से इन्कार नहीं किया जा सकता।

जिले में 1500 से अधिक वाहन ऐसे हैं, जो सालों से कंडम हालत में हैं, लेकिन सड़क पर बेधड़क दौड़ रहे हैं। भले ही ये वाहन फिटनेस में पास हों, लेकिन सड़क पर फेल हैं। अनफिट वाहनों में सफर करना किसी खतरे से कम नहीं है। ऐसे वाहन लोगों का फिटनेस तो बिगाड़ ही रहे हैं, जहरीला धुआं उगलते हुए प्रदूषण भी फैला रहे हैं। इन छोटे-बड़े वाहनों के सड़क पर दौड़ने से पैदल चलने वालों के लिए भी खतरा है। बावजूद इसके परिवहन विभाग की टीम इन जहर उगल रहे वाहनों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही है। हालात यह है कि जिला मुख्यालय पर एक हर परमिट पर 500 से अधिक गाड़ियां दौड़ रही है।

कागजों पर ही फिटनेस की जांच

जानकारी के मुताबिक कागजों पर ही वाहनों की फिटनेस चेकिंग हो रही है। परिवहन विभाग के पास अधिकृत तौर पर अनफिट वाहनों का कोई आंकड़ा भी नहीं है, जबकि विभाग के सूत्र बताते हैं कि बालोद जिला समेत प्रदेश में 60 फीसदी से अधिक व्यवसायिक वाहन बिना फिटनेस व प्रदूषण जांच के सड़कों पर दौड़ रहे हैं। ये वाहन प्रदूषण फैलाने के साथ ही लोगों को श्वांस संबंधी रोग भी बांट रहे हैं। इन वाहनों की धरपकड़ और कार्रवाई करने में परिवहन विभाग का दिलचस्पी न लेना कहीं न कहीं अधिकारी-कर्मचारियों की मिलीभगत की ओर इशारा करता है।

सख्ती का नहीं दिखता असर

विभाग के बड़े अधिकारी सभी जिलों के आरटीओ को परिवहन कानून का सख्ती से पालन कराने दिशा-निर्देश देते हैं, लेकिन सड़क पर इसका असर दिखाई नहीं देता। खासकर पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए व्यावसायिक व निजी वाहनों का जांच केंद्रों द्वारा फिटनेस प्रमाण पत्र के कागजी दावे और जमीनी हकीकत में काफी अंतर है। यही वजह है कि कंडम यात्री बस, सवारी वाहन जीप, टाटा मैजिक, ऑटो, पिकअप वैन, मिनीडोर आदि यात्री वाहनों का परिचालन हो रहा है। ऐसे वाहन अक्सर दुर्घटना का कारण बनते हैं।

देहात क्षेत्र भी अछूता नहीं

जिला मुख्यालय के अलावा ग्रामीण रूटों पर चलने वाली जीप, मिनीडोर, मेटाडोर, टाटा मैजिक में से आधे से ज्यादा जीप कंडम हो चुकी हैं। इसके बावजूद इनमें धड़ल्ले से यात्री ढोए जा रहे हैं। यहीं नहीं इन वाहनों के पास सवारी ढोने का न तो परमिट है न ही चालकों के पास लाइसेंस। परमिट वाहनों को हर साल फिटनेस जांच कराना अनिवार्य है लेकिन रोड टैक्स बचाने के चक्कर में गाड़ी मालिक आरटीओ दफ्तर नहीं जाते। समय पर गाड़ियों की मरम्मत नहीं करवाने की वजह से आए दिन कंडम वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं और कई लोगों की जानें जा रही हैं। अगर ग्रामीण रूटों पर चलने वाहनों की भी हर साल जांच की जाए तो निश्चित ही सड़क हादसों में कमी आएगी।

ये है नियम

सेंट्रल मोटर वीकल रूल 1989, 62 (1) के मुताबिक निजी वाहनों के फिटनेस की जांच 15 साल पर और व्यावसायिक वाहनों के फिटनेस की जांच हर साल की जानी है।

-फिटनेस प्रमाण पत्र न होने की स्थिति में पांच हजार रुपये जुर्माना का है प्रावधान।

Posted By: Nai Dunia News Network

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