मालीघोरी(नईदुनिया न्यूज)। बरसात के दिनों में गलघोटू व विभिन्न रोगों से बचाने के लिए पशुओं का भी टीकाकरण हो रहा है। इस काम में पशु चिकित्सा विभाग अपने-अपने क्षेत्र में जुटा हुए हैं और हर गांव में शिविर लगाकर पशुपालकों को सूचना दी जाती है कि वे अपने पशुओं को टीका जरूर लगवाएं।

इसी क्रम में ग्राम घीना में पशु चिकित्सा शिविर लगाया गया। ग्राम घीना में टेमनलाल देवांगन द्वारा पशु चिकित्सा शिविर का आयोजन किया गया। जिसमें पशुओं का टीकाकरण किया गया। इस दौरान ग्रामीण उप सरपंच डालचंद जैन, खिलानंद तारम, बिसौहा यादव, तिलक यादव, राम सुख आह्ला, लिमेश सिन्हा, गंभीर ठाकुर, परमेश धनकर और हरबंश ठाकुर उपस्थित थे। ज्ञात हो कि बरसात में अक्सर पशु (गाय-भैंस) गलघोंटू रोग की चपेट में आ जाते हैं। पशु चिकित्सा अधिकारी का कहना है कि पशुओं में लगने वाला यह जीवाणु जनित रोग संक्रमित है और तेजी से फैलता है। अगर लक्षण का पता लगने के बाद पशुओं का शीघ्र इलाज शुरू न किया जाए तो 24 घंटे के भीतर पशु की मौत हो जाती है। यह रोग 'पास्चुरेला मल्टोसीडा' नामक जीवाणु के संक्रमण से होता है। यह जीवाणु सांस नली में तंत्र के ऊपरी भाग में मौजूद होता है। मौसम परिवर्तन के कारण पशु का मुंह और खुर (गलघोंटू) रोग की चपेट में आ जाता है।

छत्तीसगढ़ में पशुओं बरसात के दिनों में होने वाली गलघोटू और एकटंगिया बीमारी से बचाव के लिए राज्य में 17 लाख 14 हजार से अधिक पशुओं को अब तक टीका लगाया जा चुका है। पशुधन विकास विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार पशुओं में होने वाली गलघोटू बीमारी से पशुधन हानि होने का अंदेशा रहता है। राज्य की सभी पशुपालकों को अपने पशुओं को उक्त बीमारी से बचाने के लिए टीकाकरण कराने की अपील की गई है। गलघोटू और एकटंगिया का टीका पशुधन विकास विभाग द्वारा शिविर लगाकर तथा पशु चिकित्सालयों एवं केन्द्रों में नियमित रूप से किया जा रहा है।

ये है रोग के लक्षण

इस रोग से ग्रस्त पशु को अचानक तेज बुखार हो जाता है। बुखार की चपेट में आने से रोगी पशु सुस्त रहने लगता है तथा खाना-पीना छोड़ देता है। पशु की आंखें भी लाल रहने लगती हैं। उसे सांस लेने में भी दिक्कत होती है। उसके मुंह से लार गिरने लगती है। नाक से स्राव बहना तथा गर्दन व छाती पर दर्द होना मुख्य लक्षण है।

ये है रोकथाम

-पशुओं को हर वर्ष बरसात के इस मौसम में गलघोंटू रोग का टीका लगवाएं।

-बीमार पशु को अन्य पशुओं से दूर रखें क्योंकि यह तेजी से फैलने वाली जानलेवा बीमारी है।

- जिस जगह पर पशु की मृत्यु हुई हो वहां कीटाणुनाशक दवाइओं का छिड़काव किया जाए।

-पशुओं को बांधने वाले स्थान को स्वच्छ रखें तथा रोग की संभावना होने पर तुरंत पशु चिकित्सकों से संपर्क करें।

यह है उपचार

यदि इस बीमारी का पता लगने पर उपचार शीघ्र शुरू किया जाए तो इस जानलेवा रोग से पशुओं को बचाया जा सकता है। एंटी बायोटिक जैसे सल्फाडीमीडीन ऑक्सीटेट्रासाइक्लीन और क्लोरोम फॉनीकोल एंटी बायोटिक का इस्तेमाल इस रोग से बचाव के साधन हैं।

टीकाकरण जरूरी है

वर्ष में दो बार गलघोंटू रोकथाम का टीका अवश्य लगाना चाहिए। पहला वर्षा ऋतु में तथा दूसरा सर्द ऋतु (अक्टूबर-नवंबर) में। डाक्टर ने सुझाव दिया कि भैंस को गर्दन के मांस में गहराई में टीका लगाया जाए तथा हर छह महीने के बाद टीकाकरण से पहले उसके ऊपर लिखी सूचना जरूर पढ़ें। टीके को दो से आठ डिग्री सेल्सियस के तापमान पर रखें।

Posted By: Nai Dunia News Network

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