बालोद। जिले भर में माताओं ने अपने बच्चों के लिए दीर्घायु की कामना के साथ हलषष्ठी व्रत का उपवास रखा। इस दौरान जगह-जगह सगरी यानी छोटा तालाब बनाकर पंडित की अगुवाई में पूजा अर्चना की गई। जिन माताओं के बधो हैं उन्होंने अपने बच्चों के दीर्घायु की कामना के साथ यह उपवास रखा। तो वहीं नव विवाहित महिलाओं ने भी संतान सुख के लिए यह व्रत रखा। सगरी में बच्चों को उतारकर उन्हें पैर धुलाने की रस्म भी अदा की गई।

बालोद मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर ग्राम खपरी में पंडित दानेश्वर प्रसाद मिश्रा ने हलषष्ठी व्रत कथा का श्रवण कराते हुए बताया कि हलषष्ठी के दिन पुत्रवती माताएं और बहनें व्रत करती हैं और अपनी संतान की दीर्घायु की कामना करती हैं। इस पर्व को बलराम जयंती भी कहा जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में हलषष्ठी को कई अलग-अलग नामों से जाना जाता है। इसे लह्ही छठ, हर छठ, हल छठ, पीन्नाी छठ या खमर छठ भी कहा जाता है। बलराम जी का मुख्य शस्त्र हल और मूसल है इसलिए उन्हें हलधर भी कहा जाता है एवं उन्हीं के नाम पर इस पावन पर्व का नाम हल षष्ठी पड़ा है। इस दिन व्रत करने वाली महिलाओं को हल से जोती गई वस्तुएं खाने की मनाही होती है। वहीं इस दिन गाय के दूध, दही और घी का सेवन नहीं किया जाता है।

ऐसी की गई हलछठ के व्रत

हलषष्ठी का व्रत माताएं संतान की खुशहाली एवं दीर्घायु की प्राप्ति के लिए और नवविवाहित स्त्रियां संतानसुख की प्राप्ति के लिए करती हैं। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस व्रत में इस दिन दूध, घी, सूखे मेवे, लाल चावल आदि का सेवन किया जाता है। हालांकि इस दिन गाय के दूध व दही का सेवन वर्जित है। हलषष्ठी के दिन प्रातः काल स्नान आदि से निवृत्त होकर दीवार पर गोबर से हरछठ चित्र मनाया जाता है। इसमें गणेश-लक्ष्मी, शिव-पार्वती, सूर्य-चंद्रमा, गंगा-जमुना आदि के चित्र बनाए जाते हैं।

सामूहिक रूप से की पूजा

धार्मिक नगरी दल्लीराजहरा, डौडी ब्लाक क्षेत्र में हलषष्ठी या कमरछठ का पर्व विधि पूर्वक मनाया गया। दल्ली राजहरा के वार्ड क्रमांक 4 वार्ड क्रमांक 13 सहित विभिन्ना वार्डों में महिलाओं ने पूजा-अर्चना कर संतान की सुख-समृद्धि के लिए कामना की। महिलाओं ने सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लिया। इसके बाद घर या बाहर कहीं भी दीवार पर भैंस के गोबर से छठ माता का चित्र बना कर भगवान गणेश और माता पार्वती की पूजा की पूजा कर छठ माता की पूजा अर्चना की। महिलाएं कई स्थानों पर एकत्रित हुई और सामूहिक रूप से पूजा अर्चना की।

संतान की लंबी आयु के लिए रखा व्रत

मालीघोरी क्षेत्र में भी संतान की लंबी आयु के लिए महिलाओं ने निर्जला व्रत रखकर कमरछठ की पूजा की। भगवान शिव की आराधना करके बिना हल के साग, सब्जी और पसहर चावल का भोग बनाकर ग्रहण किया। महिलाओं ने पुरोहितों के घर में पूजा संपन्ना की। इस व्रत को करने वाली माताएं निर्जला रहकर शिव-पार्वती की पूजा करती है। सगरी बनाकर सारी रस्में भी निभाई गई और कमरछठ की कहानी सुनकर शाम को डूबते सूर्य को अध्र्‌य देने के बाद अपना व्रत खोली।

Posted By: Nai Dunia News Network

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