थानखम्हरिया(नईदुनिया न्यूज)। रक्षाबंधन भाई बहन के पवित्र प्रेम का पर्व है। हजारों वर्षों से इस परंपरा का निर्वहन होता आ रहा है। भगवान अपने भक्त के प्रेम के वशीभूत होकर पालनहार से द्वारपाल बन जाते हैं तो भाई भी बहन की खुशी के लिये सर्वस्व न्यौछावर कर देता है। केवल लक्ष्मी को पूजेंगे तो नारायण के आने में संदेह है, लेकिन नारायण को सच्चे मन से पुकारेंगे तो लक्ष्मी भी साथ दौड़ी चली आएंगी।

पाटेश्वरधाम के ऑनलाइन सतसंग में रामबालकदास जी महात्यागी ने रक्षाबंधन की प्रसिद्घ, वेदोक्त, शास्त्रोक्त कथा का विवरण बताते हुए कहा कि एक बार भगवान ने वामन रुप बनाकर राजा बलि को तीन पग भूमि दान देने के वचन में बांधकर पहले पग में पृथ्वी और दूसरे पग में ब्रह्मलोक को नाप लिया। ब्रह्यलोक में पहुंचे चरण का अंगूठा ब्रह्मा जी ने अपने कमण्डल में धोकर गंगा जी को प्रकट किया। इसी गंगा के जल को शिवजी की जटा में डाला गया, जो तीनों लोकों को तारती है। पत्नी के कहने पर बलि ने तीसरे पग के लिये अपना शीश सामने कर दिया। भगवान ने इसके बाद बलि को सूतल लोक भेज दिया। स्वर्ग में बलि के अधिकार को छीनकर देवताओं को पुनः स्थापित करने के लिए ही भगवान ने वामन अवतार लिया था।

बाबा जी ने बताया कि सूतल लोक में बलि को इंद्र का भय सताने लगा और उसने भगवान को पुकारा तब भगवान ने बलि को रक्षा का आश्वासन दिया और वे अपने भक्त की रक्षा करने उसके द्वारपाल बन गये। भगवान इतने दयालु हैं कि अपने भक्त के लिये वे बैकुण्ठ छोड़कर सूतल लोक में द्वारपाल बन गए। भगवान ने गीता में कहा है योगक्षेम वहाम्यहम भक्त जो इच्छा करते हैं मैं उन्हें वह देता हूं और उसकी रक्षा भी करता हूं। हरिशयनी एकादशी को भगवान सूतल लोक जाते हैं। जब बैकुण्ठ सूना हो गया भगवान के बिना तीनों लोकों में हाहाकार मच गया तब शिव, ब्रह्मा आदि देव भगवान को मनाने लक्ष्मी जी को सूतल लोक भेजते हैं। लक्ष्मी ने बलि को भाई बनाकर रक्षा सूत्र बांधा बलि द्वारा बहन को उपहार मांगे जाने की बात कहने पर लक्ष्मी ने भगवान नारायण को मांगा। बाबा जी ने कहा कि हम नारायण को छोड़ लक्ष्मी की कामना करते हैं। पाप, अनीति, हिंसा, बेईमानी, अधर्म द्वारा लक्ष्मी प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, पर लक्ष्मी वहां जाती हैं, जहां नारायण अर्थात धर्म, सत्य, ईमानदारी हो। नारायण की शरण जाने पर लक्ष्मी स्वयं पीछे पीछे चली आती हैं।

Posted By: Nai Dunia News Network

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Ram Mandir Bhumi Pujan
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