साजा (नईदुनिया न्यूज)। वेदव्यास जी ने ग्रंथ का आरंभ करते हुए कहा कि सत्य ही श्रेष्ठ धर्म है। मनु महाराज ने भी दसवें धर्म के लक्षण में सत्य की गाथा कही है। मन वाणी को पवित्र करने का काम सत्य का है। अपने हृदय की बात दूसरों को प्रेषित करने का वाणी ही माध्यम होता है वाणी से ही सत्य का ज्ञान होता है। व्यक्ति को ऐसा सत्य बोलना चाहिए जो अप्रिय और निष्ठुर न हो तथा जिसमें कल्याण की भावना निहित हो। यदि आपके सत्य से प्राणियों का अहित हो तो वह सत्य सत्य नहीं है अपितु असत्य है।

समीपस्थ ग्राम बीजा तेंदूभाठा में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा प्रसंग में कथाव्यास डा इंदु भवानंद जी ब्रह्मचारी ने उक्त बातें कही। श्रीमद् भागवत कथा में जगतगुरु शंकराचार्य महाराज के कृपापात्र शिष्य डा इंदु भवानंद ने बताया कि पृथ्वी का उद्धार वाराह ने किया हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप का वध कर जनकल्याण किया और बताया कि भोग और संग्रह की प्रवृत्ति को हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष कहा जाता है। जो संग्रह करे वह हिरण्याक्ष और भोग करे वह हिरण्यकश्यप कहलाता है। हिरण्यकश्यप का वध करने के लिए भगवान नरसिंह रूप में अवतार लिए। प्रहलाद की भक्ति से शिक्षा मिलती है कि हमें संग्रह की प्रवृत्ति से दूर रहकर ईश्वर की भक्ति में ध्यान लगाना चाहिए, जिससे इस कलिकाल में मुक्ति का रास्ता तय हो। वर्तमान काल में जब पापाचारी और दुराचारी बढ़ रहे हों तो इस प्रवृत्ति से बचने का ईश्वर का ध्यान और सनातन धर्मियों की रक्षा में प्रह्लाद की भक्ति एक सूत्र का काम करती है। इसके पूर्व परमहंसी गंगा आश्रम से पधारे आचार्य पंडित राजेंद्र प्रसाद शास्त्री ने अपने उद्बोधन में कहा कि भगवान अत्यंत भक्त वत्सल होते हैं। भक्तों के हित के लिए वह अपना सर्वस्व त्याग कर देते हैं। कार्यक्रम में परमहंसी गंगा आश्रम से पधारे धारानंद ब्रह्मचारी, राघवानंद ब्रह्मचारी, गणेशगंज नरसिंहपुर, ज्योतिर्मयानंद ब्रह्मचारी सलधा, गौतम जैन बीजा, शंकराचार्य आश्रम रायपुर से नरसिह चंद्राकर, रविशंकर पटेल खैरझिटीकला, कथा आयोजक मणिशंकर भट्ट तेंदूभाठा एवं उनके परिवार के लोग उपस्थित रहे।

Posted By: Nai Dunia News Network

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