भिलाई। नईदुनिया प्रतिनिधि

भिलाई महानगर बन रहा है, लेकिन इसके कंठ सूख रहे हैं। प्यास है कि बुझती नहीं। साढ़े छह लाख आबादी वाले शहर में पानी नहीं है। धरती का पानी लगातार नीचे जा रहा है। जो बचा है उसमें भी प्रदूषण है। शिवनाथ का ही सहारा है।

भिलाई की प्यास बुझाने के लिए केंद्र, राज्य तथा स्थानीय निकाय ने पैसा पानी की तरह बहाया। फिर भी शहरवासियों की प्यासा बुझाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। जिस तेजी से जनसंख्या बढ़ रही है उसी तेजी से पानी की जरूरत भी बढ़ रही है। अब तक सात सौ करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, फिर भी शहर का स्लम एरिया बूंद-बूंद पानी को मोहताज है।

आखिर कब तक

इस सवाल ने विशेषज्ञों को चिंता में डाल रखा है। भिलाई की जनसंख्या साढ़े छह लाख के करीब पहुंच गई है। साढ़े छह लाख जनसंख्या को प्रतिदिन 219.65 लीटर पानी चाहिए। मिल पा रहा है सिर्फ 114.70 लीटर। 105.5 लीटर पानी अमृत मिशन योजना फेस-टू से देने की कोशिश होगी। वह भी सिर्फ 2033 तक। तब तक भिलाई की जनसंख्या क्या होगी। जमीन पर कितना पानी बचेगा। शिवनाथ का कब तक दोहन कर पाएंगे। इस सवाल का जवाब ढूंढ पाना मुश्किल हो रहा है।

साडा के समय बनी थी पहली योजना

साडा कार्यकाल में ही इस शहर ने अंगड़ाई लेना शुरू किया था। जनसंख्या का दबाव बढ़ने लगा। पानी के लिए तालाबों का सहारा था। लेकिन औद्योगीकरण ने तालाबों को गंदा कर दिया। साडा के समय बोर खनन कराए गए। ज्यादातर लोग इसी सरकारी नलकूप से पानी लेते थे। 1985 में जब भजन सिंह निरंकरी साडा अध्यक्ष बने तब पेयजल योजना बनी। हर प्रमुख स्थानों पर बोर खनन कर उसमें मोटर बिठाया गया। सार्वजनिक नल लगाए गए। सरकारी नलकूप और सरकारी नल से लोगों की जरूरत पूरी होने लगी।

साडा व बीएसपी का संयुक्त प्रयास

1990 के बाद साडा व बीएसपी ने मोरिद टैंक से पानी लाकर स्लम एरिया व इंडस्ट्रीयल एरिया में सप्लाई शुरू किया। इससे काफी हद तक राहत मिली, लेकिन अब जल संकट फिर गहराने लगा है। कम होती बारिश और लगातार जल का दोहन भविष्य की बड़ी चिंता बन गई है।

2006 में बनी वृहद पेयजल योजना

2006 के पहले तक भिलाई नगर निगम भी साडा की तर्ज पर ही लोगों को सरकारी नलकूप तथा सार्वजनिक नलों से पानी देता रहा। 2006 में तत्कालीन भाजपा सरकार के मंत्री रहे प्रेम प्रकाश पाण्डेय वृहद पेयजल योजना लाए। इस योजना का काम तेजी से चला। पांच सौ करोड़ की इस योजना से शिवनाथ नदी को भिलाई से जोड़ा गया। 77 एमएलडी फिल्टर प्लांट बना। तब के मंत्री अमर अग्रवाल ने इस योजना को भागीरथी नल जल योजना कहा था। उन्होंने ही प्रेमप्रकाश पाण्डेय को भिलाई का भागीरथी नाम दिया था। लिहाजा इस योजना के लिए प्रेमप्रकाश पाण्डेय को पानी वाले बाबा भी कहा जाने लगा।

बिकने लगे थे घर

वृहद पेयजल योजना के पहले भिलाई के पॉश इलाकों में पानी के लिए त्राहिमाम के हालात थे। खासकर नेहरू नगर की स्थिति पानी के मामले में बेहद दयनीय थी। गर्मी के दिनों में सारे निजी बोर सूख जाते थे। हालात यह थे कि पानी की किल्लत के चलते कई लोगों ने अपना घर औने-पौने दाम में बेचकर दूसरी जगहों पर शिफ्ट हो गए, लेकिन शिवनाथ नदी की जलधारा ने कईयों को पलायन करने से रोक दिया।

2009 में आया शिवनाथ का पानी

पांच सौ करोड़ की लागत वाला वृहद पेयजल योजना फेस वन के जरिए पवित्र शिवनाथ नदी का पानी पहली बार 2009 में भिलाई आया। काम की तेजी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2006 से लेकर 2009 तक इन तीन सालों में दुर्ग शिवनाथ नदी में इंटकवेल बनाने से लेकर दुर्ग से भिलाई तक पाइप लाइन बिछाने, 77 एमएलडी फिल्टर प्लांट बनाने, दस ओवरहेड टंकियों का निर्माण सहित घर-घर तक पाइप लाइन बिछाने का काम पूरा हो चुका था। इसके लिए भिलाई नगर निगम को 2010 में राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिल चुका है। पुरस्कार भिलाई की तत्कालीन महापौर निर्मला यादव ने ग्रहण किया था।

इसलिए आई दिक्कत

इस योजना के शुरू होते ही तत्कालीन नगरीय निकाय मंत्री अमर अग्रवाल ने बीएपीएल कार्डधारियों को निःशुल्क कनेक्शन देने का ऐलान कर दिया था। पार्षदों के माध्यम से वार्ड-वार्ड में अंधाधुंध कनेक्शन बांटे गए। जहां-तहां पाइप लाइन बिछा दिया गया। नतीजा यह हुआ कि निचली बस्तियों खासकर स्लम एरिया में नलों से पानी ही नहीं पहुंच पाया। कार्य में लापरवाही अब भारी पड़ रही है।

टैंकर वाला वार्ड, अब तक 20 करोड़ खर्च

भिलाई के दो वार्डों की स्थिति तो इस कदर खराब है कि गर्मी तो छोड़िए ठंड व बरसात के मौसम में भी यहां टैंकरों से पानी सप्लाई किया जाता है। ये वार्ड है वार्ड नंबर 24 तथा वार्ड नंबर पांच। इन वार्डों को अब लोग टैंकर वाला वार्ड कहने लगे हैं। यहां घर-घर नल तो लगे हैं, लेकिन किसी भी नल में पानी नहीं आता। आता भी है तो बूंद-बूंद टपकने वाली स्थिति में। गर्मी के दिनों में तो यहां के सरकारी नलकूप भी जवाब दे देते हैं।

हर साल पानी पर एक करोड़ खर्च

वृहद पेयजल योजना का पानी सुपेला, कैम्प तथा खुर्सीपार के कई वार्डों तथा मोहल्लों में नहीं पहुंच पाता। भिलाई नगर निगम यहां टैंकरों के माध्यम से पानी सप्लाई करता है। जिम्मेदारी जोन की होती है। भिलाई नगर निगम टैंकर से पानी सप्लाई के लिए हर साल औसतन एक करोड़ रुपये खर्च करता है। सन 2001 से लेकर अब तक भिलाई नगर निगम द्वारा टैंकर से पानी के नाम पर 20 करोड़ से ज्यादा खर्च किया जा चुका है।

डेढ़ करोड़ की योजना चौपट

छावनी व खुर्सीपार में बढ़ती पानी की जरूरत को देखते हुए 2014-15 में छावनी में 1.5 एमएलडी फिल्टर प्लांट बनाया गया था। इस योजना के लिए डेढ़ करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। इस फिल्टर प्लांट में मोरिद टैंक से पानी लाने की योजना थी। इसके लिए मोरिद टैंक से छावनी फिल्टर प्लांट तक पाइप लाइन तक बिछाया जा चुका था। तत्कालीन नगरीय निकाय मंत्री अमर अग्रवाल ने इसका लोकार्पण किया था। यह फिल्टर प्लांट कभी शुरू ही नहीं हो पाया। नईदुनिया ने जब इसकी पड़ताल की तो इसकी दो वजह बताई गई। पहले की मोरिद टैंक से फिल्टर प्लांट तक बिछे पाइप लाइन में जगह-जगह लीकेज हो गया था। टैंक का पानी प्लांट तक पहुंच ही नहीं पाता था। दूसरी वजह यह बताई गई कि मोरिद टैंक के पानी को भरने के लिए जो संपवेल टैंक बनाया गया था उसमें उद्योगों का केमिकल पानी रिसने लगा है।

टैंकरों के आता है काम

डेढ़ करोड़ का 1.5 एमएलडी फिल्टर प्लांट चौपट हो गया। बाद में इस फिल्टर प्लांट को 77 एमएलडी फिल्टर प्लांट से जोड़कर पानी सप्लाई किया जाने लगा। 77 एमएलडी फिल्टर प्लांट से जो पानी यहां टैंक में भरता है उसे टैंकरों के माध्यम से मोहल्लों में सप्लाई किया जाता है।

इस गर्मी पानी ने बेहद रुलाया

इस गर्मी ने भिलाई को पानी के लिए बेहद रुलाया है। गर्मी शुरू होते ही सारे नलकूप ने पहले ही जवाब दे दिया। नलों में प्रेशर कम हो गया। ट्रांसफार्मर जल जाने की वजह से भीषण गर्मी में इंटकवेल से सात दिनों तक पानी सप्लाई नहीं हो सका। तीन दिन पाइपों के लीकेज सुधारने के नाम पर पानी बंद रहा। दो दिन इंटकवेल का मोटर खराब हो जाने की वजह से वाटर सप्लाई नहीं हो सका। गर्मी में सुपेला, कैम्प तथा खुर्सीपार, रुआबांधा, रिसाली, मरोदा तथा कोहका में लोगों को बेहद तकलीफ झेलना पड़ा।

अब फेस टू का सहारा

भिलाई नगर निगम की प्यास बुझाने 247 करोड़ की लागत से अमृत मिशन योजना फेस टू का काम चल रहा है। आइए जानते हैं कि अब तक क्या काम हो चुका है क्या काम बचा है।

0-इस योजना के तहत दो वाटर ट्रीटमेंट प्लांट बन चुका है। पहला नेहरू नगर गुरद्वारे के पास 66 एमएलडी फिल्टर प्लांट, दूसरा मोरिद टैंक के पास 6 एमएलडी फिल्टर प्लांट (कुल 72 एमएलडी फिल्टर प्लांट)

0-कोहका में दो टंकी हाउसिंग बोर्ड, छावनी में दो टंकी, रुआबांधा, नेवई, मोरिद, डुण्डेरा, तथा पुरैना में एक हजार लीटर से लेकर 32 हजार लीटर वाली दस पानी टंकियों का निर्माण किया जा रहा है। जिसमें ज्यादातर पानी टंकी कम्पलीट होने की स्थिति में है।

0-भिलाई नगर निगम की पुरानी टंकियों तथा बन रही नई टंकियों से घर-घर नल कनेक्शन देने के लिए पाइप लाइन बिछाने का काम 80 प्रतिशत तक कम्पलीट हो चुका है।

0-यहां से गुजरेगी पाइप लाइन-32 बंगला के पास रेलवे लाइन, मरोद गेट रेल लाइन, पुरैना स्टोर पारा रेल लाइन, नेहरू नगर नेशनल हाइवे, भिलाई नगर रेलवे स्टेशन के पास तथा सुपेला थाने के पास नेशनल हाइवे को काटकर पाइप लाइन बिछाया जाना है। इसमें नेशनल हाइवे को काटकर पाइप लाइन बिछाने का काम कम्पलीट हो चुका है, पर रेलवे से एनओसी नहीं मिलने की वजह से रेल लाइन के नीचे से पाइप लाइन बिछाने का काम रुका हुआ है।

इस साल मिलना था पानी

अमृत मिशन फेस 2 का काम 2016 में शुरू हुआ था। काम कम्पलीट करने की मियाद 2018 तक थी। पाइप लाइन बिछाने से लेकर, टंकी बनाने तक का सारा काम अलग-अलग ठेका एजेंसियों को दिया गया था, बावजूद काम समय सीमा पर पूरा नहीं हो सका। काम पूरा होने में एक साल का समय और लगना है।