भिलाई (वि.)। श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ में पर्युषण महापर्व के बाद चैत्य परिपाटी के लिए देशभर से यात्रियों, संघों का प्रतिदिन आगमन हो रहा है। इस अवसर पर साध्वी लक्ष्ययशा श्री जी ने कहा कि जीवन में सत्संग जरुरी है। सत्संग हमें चिंतन के लिए प्रेरित करता है। चिंतन आध्यात्म जगत का वह प्रवेश द्वार है जहां गुरु के सान्निाध्यता से अच्छा-बुरा का अभिज्ञान होता है। सही चिंतन को अपनाये न कि चिंता को। कहा कि जीवन में चिंता को अपनाया तो चिता की तैयारियां हो जायेगी।

नगपुरा तीर्थ में बुधवार को महेश भाई शाह, दिनेशभाई लालन सूरत, हेमराज पी जैन, रमेश कोठारी मुम्बई, संजय जैन इचलकरंजी तथा श्री 108 भक्ति महिला मंडल सूरत आदि सैकड़ों भाविक संघ यात्रार्थ पहुंचे। यात्रियों ने तीर्थ संकुल के सभी जिनालयों में दर्शन पूजन किया। संघ यात्रा के यात्रियों का धर्मसभा में तीर्थ की ओर से स्वागत किया गया। धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए तीर्थ प्रतिष्ठाचार्य श्री राजयश सूरीजी की आज्ञानुवर्तिनी तपस्विनी साध्वी लक्ष्ययशा श्री जी ने कहा कि जीवन में सत्संग जरुरी है। उन्होंने कहा कि हर परिस्थिति का डटकर सामना करें। हर पहलू पर चिंतन करें, सही चिंतन को अपनाये न कि चिंता को। यदि चिंतन की जगह चिंता को अपनाया तो चिता की तैयारियां हो जायेगी। एक विचारक के शब्दों में चिन्ता घूमती कुर्सी है, जो आपको ऊपर नीचे घूमाती रहेगी, किन्तु कहीं पहुंचायेगी नहीं। उसका काम घुमाने का ही है, किसी लक्ष्य पर पहुंचाने का नहीं। चिन्ता मानसिक शक्ति को खाने वाला कीड़ा है। चिन्ता और चिता एक समान हैं। दो प्रकार के कीड़े होते हैं। एक कीड़ा तो ऊपर से खाता है। दूसरा भीतर से। घुन (उदी-दीमक) जिस वृक्ष को लग जाती है, वह उस वृक्ष को खा जाती है। ऊपर से तो वृक्ष की स्थूल काया बराबर दिखाई देगी किन्तु अन्दर से वह खाली हो जाती है। चिन्ता भी एक घुन है जो छिपे तौर पर मानव की शक्ति खाया करती है। वह शारीरिक ही नहीं, मानसिक शक्ति को भी खा जाती है। जैसे खड़ी फसल पर ओले गिरने से वह खड़ी फसल मुर्झा जाती है, इसी प्रकार चिन्ता के ओले प्रसन्नता की हरियाली समाप्त कर देते हैं। वे छुपे हुए ओले हैं। चिन्ता के ओलों में वजन तो कुछ भी नहीं है किन्तु उन दूसरे ओलों की अपेक्षा इनकी संहारक शक्ति प्रखर है।