भिलाई। कुम्हारी से नौ किलोमीटर दूर ग्राम नारधा में बाबा रूक्खड़नाथ के समाधि स्थल और वहां स्थित गोबर के हनुमान जी के मंदिर के प्रति लोगों की अपनी अलग ही आस्था है।

नारधा सहित आसपास के एक दर्जन से भी अधिक गांव में शादी के बाद आने वाली डोली पहले बाबा रूक्खड़नाथ के समाधि स्थल पर पहुंचती है, नव दंपती पूजा अर्चना करते हैं इसके नई दुल्हन घर पहुंचती है। ग्रामीणों की मानें तो तीन सौ से भी अधिक वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है। ऐसा करने से नव दंपती के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। इस स्थान से कई और मान्यताएं भी जुड़ी हैं।

ग्राम पंचायत नारधा की आबादी करीब ढ़ाई हजार है। इस गांव के एक छोर पर ही सैकड़ों साल पुराना पीपल का वृक्ष है। इस वृक्ष के नीचे ही बाबा रूक्खड़नाथ का समाधि स्थल है और इसी परिसर में ही हनुमान जी का मंदिर है। इसमें विराजित हनुमान जी की प्रतिमा बाबा रूक्खड़नाथ द्वारा विशेष प्रजाति की सुरही गाय के गोबर से बनाई गई थी, ऐसा ग्रामीणों का मानना है।

ग्रामीण हुनमान जी के मंदिर और बाबा के समाधि स्थल दोनों की ही पूजा अर्चना करते हैं। साल में तीन बार रथ यात्रा, दशहरा एवं शिवरात्रि के दिन यहां विशेष पूजा की जाती है इसके अलावा मेला भी लगता है।

सालों से चली आ रही परंपरा

बाबा रूक्खड़नाथ के प्रति आस्था रखने वाले नारधा ही नहीं आसपास के कई गांव के लोग हैं। आसपास के मोंहदी, मुडपार, बीरोभाट, चेटुआ, रिंगनी, ढौर, खेरधा, मुरमुंदा, अछोटी सहित अन्य गांव के लोग नई बहू का डोला लेकर पहले बाबा रूक्खड़नाथ के समाधि स्थल और हनुमान जी के मंदिर में पहुंचते हैं। यहां बकायदा नव दंतपी द्वारा पूजा अर्चना कराई जाती है। मंदिर में कुछ देर ठहरने के बाद घर पहुंचती है।

गांव के ही चंद्रहास गिरी बताते हैं कि उनके बुजुर्ग बताते थे कि कई सालों से यह परंपरा चली आ रही है। किवदंती यह भी है कि जिन महिलाओं को संतान नहीं होता वे भी मुट्ठी में पत्थर का टुकड़ा लेकर बाबा रूक्खड़नाथ के समाधि स्थल का सात फेरा लगा लें तो उनकी गोद खाली नहीं रह जाती।

तीन सौ साल पहले का आश्रम

ग्रामीणों की मानें तो करीब तीन सौ साल पहले बाबा रूक्खड़नाथ नारधा गांव पहुंचे थे, वे नागा बाबा थे, गांव के बाहर ही पीपल के वृक्ष के नीचे अपना आश्रम बनाया था। जंगली जानवरों से बचने के लिए आश्रम के चारो ओर गहरा खाईनुमा गड्ढा भी बनाया गया था। जो अब पूरी तरह पट चुका है।

परिसर में ही एक बावली है जिसका पानी भीषण गर्मी के बावजूद नहीं सूखता। गांव के ही बजरंग गिरी गोस्वामी का कहना है कि फसल में बीमारी होने पर किसान मंदिर में श्री फल चढाने के बाद बावली के पानी का छिड़काव खेतों में करते हैं, इससे बीमारी दूर हो जाती है। इस बावली के पास ही बाबा का चूल्हा भी था।

बाबा के भाई की पांचवी पीढ़ी वर्तमान में पुजारी

बाबा रूक्खड़नाथ के आने के बाद उनके भाई दत्तगिरी गोस्वामी भी गांव पहुंचे। वे सांसारिक जीवन से जुड़े थे। वर्तमान में उनकी पांचवी पीढ़ी इस मंदिर की देखरेख व पूजा अर्चना की जाती है। मंदिर के मुख्य पुराहित सुरेंद्र गिरी गोस्वामी बताते हैं कि बाबा रूक्खड़नाथ के कई चमत्कार उन्होंने भी ग्रामीणों से सुनी हैं। लोगों की श्रद्धा और आस्था इस मंदिर से जुड़ी हुई है।

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Posted By: Nai Dunia News Network

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