पी. रंजन दास, बीजापुर। दुनिया में परिवहन के साधनों का तेजी से विकास हो रहा है, आपसे कहें कि देश के एक हिस्से में 33 गांव ऐसे हैं, जहां आज भी बैलगाड़ी ही परिवहन का मुख्य साधन है, तो एकबारगी यकीन नहीं होगा। इससे भी खास बात यह कि परिवहन एक्ट की तरह इन बैलगाड़ियों के पीछे बाकायदा नंबर प्लेट लगा होता है, जिसमें उसके मालिक का नाम, गांव और बैलगाड़ी नंबर लिखा होता है। दरअसल, वक्त जरूरत पर बैलगाड़ी की सुविधा पाने के लिए उसके मालिक से आसानी से संपर्क कर सकें, इसलिए यह व्यवस्था बनाई गई है। संभवत: देश में अपनी तरह की यह इकलौती व्यवस्था होगी।

जिला मुख्यालय से लगभग 125 किलोमीटर दूर इंद्रावती नेशनल पार्क के अंतर्गत आने वाले सेंडरा, पिल्लूर समेत चार पंचायतों के 33 गांवों में यह व्यवस्था है। विकास की चकाचौंध से दूर इस इलाके में मोबाइल कनेक्टिविटी नहीं है। बैलगाड़ी के लिए मालिक को ढूंढना हो तो काफी मुश्किल हो सकता है।

ऐसे में नाम, पता और गांव में गाड़ियों की मौजूदा संख्या से यह परेशानी हल हो जाती है। आज जब दुनिया तेजी से भाग रही है, यहां की व्यवस्था चौंका देती है।

और कोई साधन नहीं

बीते तीस वर्षों में सरकारी उपेक्षा के चलते देश-प्रदेश से अलग-थलग पड़े इस इलाके की साढ़े पांच हजार की आबादी आज भी परिवहन के लिए बैलगाड़ियों पर ही निर्भर है। गांव का हर परिवार बैलगाड़ी संपन्न् नहीं है। ऐसे में सफर करना हो, अनाज ढुलवाना या अन्य कोई जरूरी काम करना हो, किराए पर बैलगाड़ी लेना ही एकमात्र साधन है।

धार्मिक अथवा पारिवारिक आयोजनों के लिए भी बैलगाड़ी किराए पर लेना जरूरी हो जाता है। छोटेकाकलेर के येलादी सुरैया एक बैलगाड़ी के मालिक हैं। पिल्लूर से सेंडरा के रास्ते के एक गांव में बैलगाड़ी और उसके मालिक मिले।

गाड़ी पर दो मुसाफिर भी सवार थे। गाड़ी के पिछले हिस्से पर मालिक का नाम और नंबर लिखा हुआ था। पूछने पर गाड़ी हांक रहे सुरैया के अलावा उस पर सवार ग्रामीणों ने बताया कि रिश्तेदारियों से लेकर राशन लाने तक के लिए उन्हें लंबा सफर तय करना होता है। ऐसे में दुर्गम इलाकों में जाने के लिए बैलगाड़ी ही साधन है। इसीलिए सभी गांवों में कई बैलगाड़ियां हैं।

Posted By: Sandeep Chourey