गणेश मिश्रा, बीजापुर। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले के इंद्रावती टाइगर रिजर्व के दायरे में आने वाली चार पंचायतों में पिछले 40 साल से चुनाव नहीं हुए हैं। लोकसभा और विधानसभा चुनाव में यहां के तीन मतदान केंद्रों को 110 किमी दूर ब्लॉक मुख्यालय भोपालपटनम में शिफ्ट किया जाता है। यहां पंच-सरपंच के चुनाव निर्विरोध निपटाए जाते हैं। नेशनल पार्क के मूल बाशिंदे करीब छह हजार आदिवासी जानते ही नहीं कि चुनाव क्या होता।

नेशनल पार्क के भीतर 33 गांव हैं जिन्हें सेंड्रा, एडापल्ली, काकलेर और केरपे पंचायतों रखा गया है। यह समूचा इलाका आज भी आदिम युग में है। भोपालपटनम के रास्ते दो दिन पैदल या बैलगाड़ी के जरिए यहां तक पहुंचा जा सकता है। घने जंगल, नदी-नाले-पहाड़ लांघकर आदिवासी राशन लेने तो आते हैं पर मतदान के लिए उतनी दूर कोई नहीं आना चाहता।

1980 में बस्तर में नक्सलवाद ने दखल दिया और उसके बाद से कभी भी इन चार पंचायतों में चुनाव नहीं हुए। यहां नक्सलियों की समानांतर सत्ता चलती है। 2005 में नक्सल विरोधी अभियान सलवा जुड़ूम शुरू होने के बाद गांव के कुछ परिवार वहां से भागकर भोपालपटनम के शिविर में आ गए। प्रशासन की पहुंच इन पंचायतों में उन्हीं तक है जो बाहर आ गए हैं। उन्हीं में से किसी को हर बार सरपंच नामांकित कर दिया जाता है। सरपंच कभी गांव जाते नहीं, न ग्रामीण जानते हैं कि इस बार कौन सरपंच है।

1980 में आखिरी बार गांव से नामांकित हुए थे सरपंच

सेंड्रा पंचायत के पूर्व सरपंच रामलाल मेटा अंतिम ऐसे सरपंच रहे जो गांव में ही रहते थे। 1980 में भी सरपंच निर्विरोध ही चुना गया था क्योंकि इन दुरूह जंगलों में मतदान दलों का पहुंचना मुश्किल था। रामलाल मेटा का जन्म 1953 में हुआ था। वह कहते हैं कि तब गांव से जो लोग बाजार जाते थे उनके नाम सरकारी अधिकारी पता कर लेते थे और किसी एक को नामांकित कर देते थे।

बाद में गांव के कई लोग पलायन कर कस्बों में चले गए। अब उन्हीं में से किसी को नामांकित कर दिया जाता है। मेटा कहते हैं कि यहां सड़क, पानी, बिजली, शिक्षा-स्वास्थ्य किसी चीज का इंतजाम सरकार ने नहीं किया। पंचायतीराज व्यवस्था में कुछ काम हो सकता था पर उन्होंने 40 साल से किसी सरपंच को गांव आते देखा ही नहीं है।

Posted By: Hemant Upadhyay

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