बिलासपुर । Nirjala Ekadashi 2020 निर्जला एकादशी का व्रत मंगलवार को रखा जाएगा। श्रद्घालु निर्जला व्रत करेंगे और जरूरतमंदों की मदद करने दान-पुण्य भी करेंगे। इसके लिए कई संस्थाएं भी आगे आई हैं। मंदिरों के पट बंद हैं। इसके बाद भी निर्जला व्रत पर वहां भी विशेष पूजन होगा। लॉकडाउन की स्थिति को देखते हुए इस बार आस्थावान जरूरमंदों की मदद के लिए दान करेंगे। इससे क्वारंटाइन सेंटरों में दान किया जाएगा। इसके लिए लोगों ने दिनभर खरीदारी भी की, जिससे बाजार में भीड़ रही।

इधर, कई सामाजिक संगठनों व संस्थाओं ने भी इस दिन दान की परंपरा निभाते हुए लोगों की मदद करने की ठानी है। वैसे भी यह एकादशी व्रत धारण कर यथाशक्ति दान करने के लिए ही है। इसमें अन्न, जल, वस्त्र, आसन, जूता, छतरी, पंखी व फल आदि का दान करने का विधान है। इस दिन जल कलश का दान, ककड़ी, खरबूजा, आम, मटकी, सुराही भी दान की जाती है।

ये संस्थाएं आईं आगे

निर्जला एकादशी पर दान के लिए कई संस्थाओं ने पहल की है। इसी कड़ी में एक नई पहल संस्था की ओर से 15 परिवारों के 49 सदस्यों को भोजन दिया जाएगा। पंजाबी समाज की ओर से भी दान किया जाएगा। दयालबंद गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष सरदार मनजीत सिंह ने बताया कि इस पावन पर्व पर जरूरमदों के लिए अन्न का दान किया जाएगा। साथ ही समाजसेवी नीरज गेमनानी भी व्यक्तिगत रूप से भी अन्नदान कर सेवा देंगे।

मटकों और फल की रही मांग

दान करने के लिए मटकों और फल की बाजार में मांग रही। बड़ी संख्या में श्रद्घालुओं ने दान करने मटकी-सुराही और फलों की जमकर खरीदारी की।

भीमसेन के नाम पर है व्रत

निर्जला एकादशी से संबंधित पौराणिक कथा के कारण इसे पांडव एकादशी और भीमसेनी एकादशी या भीम एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पांडवों में दूसरा भाई भीमसेन खाने-पीने के अत्यधिक शौकीन थे और अपनी भूख को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं थे। इसी कारण वे एकादशी व्रत को नहीं कर पाते थे। भीम के अलावा बाकी पांडव भाई और द्रौपदी साल की सभी एकादशी व्रतों को पूरी श्रद्धा भक्ति से करते थे।

भीमसेन अपनी इस लाचारी और कमजोरी को लेकर परेशान थे। उन्हें लगता था कि वे एकादशी व्रत न करके भगवान विष्णु का अनादर कर रहे हैं। इस दुविधा से उबरने के लिए वे महर्षि व्यास के पास गए। तब उन्होंने भीमसेन को साल में एक बार निर्जला एकादशी व्रत करने की सलाह दी और कहा कि निर्जला एकादशी साल की 24 एकादशियों के तुल्य है। तब भीमसेन ने यह कठोर व्रत रखा। इसी पौराणिक कथा के बाद निर्जला एकादशी का नाम भीमसेनी एकादशी और पांडव एकादशी के नाम से प्रसिद्घ हो गई।

मिलता है वर्षभर की एकादशी का फल

इस व्रत का धार्मिक महत्व है। ऐसा माना जाता है कि इस एकादशी व्रत के करने मात्र से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिल जाती है। साथ ही वर्षभर में पड़ने वाली सभी एकादशी का पूर्ण फल जेष्ठ मास की एकादशी व्रत करने से मिल जाता है। साथ ही इस एकादशी का व्रत करने से अन्य एकादशियों में अन्न खाने का दोष छूट जाता है।

व्रत के नियम भी कड़े है। यह व्रत निर्जल रखा जाता है यानी व्रती को बिना पानी का सेवन किए रहना होता है। ज्येष्ठ माह में बिना पानी के रहना बहुत बड़ी बात होती है। यह व्रत एकादशी तिथि के दिन सूर्योदय से लेकर द्वादशी के दिन व्रत पारण मुहूर्त तक रखा जाता है।

धार्मिक महत्व

निर्जला एकादशी व्रत पौराणिक युगीन ऋषि-मुनियों द्वारा पंचतत्व के एक प्रमुख तत्व जल की महत्ता को निर्धारित करता है। जप, तप, योग, साधना, हवन, यज्ञ, व्रत, उपवास सभी अंतःकरण को पवित्र करने के साधन माने गए हैं। इससे काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर और राग-द्वेष से निवृत्ति मिलती है। निर्जला व्रत में व्रती जल के कृत्रिम अभाव के बीच समय बिताता है। जल उपलब्ध होते हुए भी उसे ग्रहण न करने का संकल्प लेने और समयावधि के बाद जल ग्रहण करने से जल तत्व के बारे में व पंचभूतों के बारे में मनन शुरू होता है।

यह है वैज्ञानिक महत्व

वैज्ञानिक भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि मनुष्य शरीर में यदि जल की कमी आ जाए तो जीवन खतरे में पड़ जाता है। जल को एक पेय के स्थान पर तत्व के रूप में मानना चाहिए।

Posted By: Nai Dunia News Network

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