High Court :बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में आरक्षण को लेकर मामला एक बार फिर गरमाने लगा है। अधिवक्ता हिमांक सलूजा ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में याचिका दायर कर राज्यपालद्वारा आरक्षण बिल में जल्द हस्ताक्षर करने व राज्य में बन रही अराजक स्थिति को जल्द साफ करने की मांग की है। याचिकाकर्ता अधिवक्ता ने कहा कि राज्यपाल के निर्देश पर राज्य श्ाासन ने आरक्षण में किए गए बढ़ोतरी के बाद विधानसभा का विशेष सत्र का आयोजन किया था। इसके बाद बिल को राज्यपाल के हस्ताक्षर के लिए राजभवन प्रेषित किया गया है। राज्यपाल द्वारा अब तक बिल में हस्ताक्षर ना किए जाने के कारण आरक्षण व्यवस्था नहीं बन पा रही है। इसके चलते स्थिति भी स्पष्ट नहीं हो पा रही है।

याचिका में कहा है कि छत्तीसगढ़ विधान सभा ने छत्तीसगढ़ लोक सेवा (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछडा वर्गों के लिए आरक्षण) (संशोधन) अधिनियम -201 (बाद में संशोधन अधिनियम के रूप में संदर्भित) को पारित कर दिया है। इसके तहत छत्तीसगढ सार्वजनिक सेवा (अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछडे वर्ग) अधिनियम -1994 (बाद में अधिनियम -194 के रूप में संदर्भित किया गया) और ने कहा कि संशोधन द्वारा, पहले, दूसरे, तीसरे और चौथे वर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था कुछ इस तरह की गई है। अनुसूचित जाति 12 प्रतिशत,अनुसूचित जनजाति 32 प्रतिशत व अन्य पिछडा वर्ग-14 प्रतिशत को वृद्धि करते हुए 76 फीसद करने का प्रस्ताव राज्य शासन ने किया है। इसके लिए राज्य शासन ने विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर इसे सर्वसम्मति से पारित किया गया है। विधानसभा से प्रस्ताव पारित करने के बाद बिल को कानूनी अमलीजामा पहनाने के लिए राजभवन के हवाले किया गया है। याचिका के अनुसार राज्यपाल द्वारा बिल पर हस्ताक्षर नहीं करने के कारण स्थिति पूरी तरह अस्पष्ट है। याचिकाकर्ता अपनी याचिका में कहा है कि राज्यपाल ने बीते दिनों एक हस्ताक्षर में कहा कि वह आरक्षण के मुद्दे पर दिल्ली प्रवास पर जाएंगी। इस दौरान राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री और गृह मंत्री के साथ बैठक के बाद बिल के भाग्य का फैसला करेंगे। उसने आगे प्रेस साक्षात्कार में कहा था कि उसे परामर्श करना चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि राज्यपाल राज्य शासन के अनुरोध को लगातार ठुकरा रही है। इससे शिक्षित बेरोजगारों के भविष्य पर सवाल उठ खड़ा हो रहा है।

वर्ष 2012 के बाद से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के संबंध में कुल आरक्षण अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (संशोधन अधिनियम), 2011 के लिए छत्तीसगढ सार्वजनिक सेवा आरक्षण के दौरान 58 फभ्सद की सीमा तक था। इस संशोधन अधिनियमित अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड;े वर्ग अधिनियम, 1994 के लिए मूल मध्य प्रदेश सार्वजनिक आरक्षण में संशोधन किया गया था।

58 फीसद आरक्षण को दी गई थी चुनौती

राज्य शासन द्वारा आरक्षण की सीमा में जब 58 प्रतिशत बढ़ोतरी की गई थी तब उस वक्त इसे चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी। वर्तमान में राज्य श्ाासन ने आरक्षण व्यवस्था में बदलाव करते हुए इसे 76 फीसद कर दिया है।

छत्तीसगढ विधान सभा ने आरक्षण बिल को सर्वसम्मति से पारित किया है। जो कि विधेयक के अनुसार दो दिसंबर 2022 के अनुसार 32 फीसअनुसूचित 13 प्रतिशत अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं, 27 प्रतिशत अन्य पिछडा वर्ग के लिए आरक्षित हैं और आर्थिक कमजोर वर्ग के लिए चार प्रतिशत तय किया गया है।

परीक्षा के बाद अटकी भर्ती

आरक्षण विवाद के कारण लिखित परीक्षा के बाद 897 पदों पर भर्ती अटकी हुई है। पीएससी 2021 के 171 पद, आयुर्वेद अधिकारी के 132, राज्य वन सेवा परीक्षा 2020 के 211, असिस्टेंट डायरेक्टर रिसर्च 2018 के दो पद, भृत्य पीएससी परीक्षा में चयनित 11 पद, राज्य अभियांत्रिकी सेवा परीक्षा 2021 के 85, फिजियोथेरेपिस्ट परीक्षा 2022 के 15, भृत्य भर्ती परीक्षा 2022 के 80, साइंटिफिक आफिसर 2022 के 23, कैज्यूअलिटी मेडिकल आफिसर 2022 के 21, सहायक प्राध्यापक नर्सिंग परीक्षा 2021 के 33, डेमोस्ट्रेटर नर्सिंग परीक्षा 2021 के 58 व माइनिंग इंस्पेक्टर परीक्षा 2022 के 35 पदों पर भर्ती अटकी है।

Posted By: Yogeshwar Sharma

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