बिलासपुर । बुधवार को तीन याचिकाओं पर जस्टिस गौतम भादुड़ी की सिंगल बेंच में एकसाथ सुनवाई हुई । शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने अपने जवाब में कहा है कि आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए 10 प्रतिशत के आरक्षण को राज्य शासन ने समाप्त कर दिया है। अतिरिक्त महाधिवक्ता के खुलासे के बाद हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा नौ फरवरी को आयोजित की जाने वाली भर्ती परीक्षा के प्रतिभागियों विक्रम सिंह,अस्र्ण पाठक व इरफान कुरैशी ने अपने वकीलों के जरिए हाई कोर्ट में अलग-अलग याचिका दायर कर राज्य शासन द्वारा की गई घोषणा के अनुसार आर्थिक रूप से पिछड़े (ईडब्ल्यूएस) वर्ग के लिए नौकरी में 10 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की जानकारी दी।

राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा भर्ती परीक्षा के लिए जारी विज्ञापन में ईडब्ल्यूएस के लिए आरक्षण की व्यवस्था नहीं की है। याचिकाकर्ताओं ने शासन द्वारा की गई घोषणा के अनुरूप 10 प्रतिशत आरक्षण की मांग की है। बीते सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने राज्य शासन को नोटिस जारी कर जवाब पेश करने कहा था। बुधवार को यह मामला जस्टिस गौतम भादुड़ी की सिंगल बेंच में लगा था।

शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता अमृतो दास ने पैरवी की । अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि राज्य शासन ने आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए 13 नवबंर 2019 को अध्यादेश पारित किया था। अध्यादेश स्वत: समाप्त हो गया है।

अध्यादेश के स्वत: समाप्त हो जाने के कारण ईडब्ल्यूएस को आर्थिक आधार पर आरक्षण नहीं दे सकते। अतिरिक्त महाधिवक्ता ने यह भी जानकारी दी कि राज्य शासन ने दो व तीन अक्टूबर को विधानसभा के विशेष सत्र का आयोजन किया था। इस दौरान तकनीकी कारणों के चलते अध्यादेश को पारित नहीं कराया जा सका।

वकील रोहित ने संवैधानिक व्यवस्था का उठाया सवाल

याचिकाकर्ता विक्रम सिंह की ओर से पैरवी करते हुए वकील रोहित शर्मा ने संवैधानिक व्यवस्था का सवाल उठाते हुए कहा कि दो व तीन अक्टूबर को महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती पर चर्चा करने के लिए विशेष सत्र का आयोजन किया गया था। विशेष सत्र में अध्यादेश पर चर्चा होने का सवाल ही नहीं उठता है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार अध्यादेश बंधनकारी

वकील रोहित शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के एक निर्देश का हवाला देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 213 के तहत लाए गए अध्यादेश राज्य शासन के लिए बंधनकारी है। इसे हर हाल में सदन के पटल पर रखने की बाध्यता है। वकील ने संवैधानिक व्यवस्था का हवाला देते हुए कहा कि उन्हीं अध्यादेश के लिए राज्य शासन सदन के पटल पर रखने के लिए बाध्यकारी नहीं होता जिसे समाप्त करने की घोषणा कर दी जाती है।

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 10 प्रतिशत आरक्षण के लिए राज्य शासन ने अध्यादेश लाया है। इसे समाप्त करने की घोषणा नहीं की है। लिहाजा इसे सदन के पटल पर रखना राज्य शासन के लिए बंधनकारी है। यह देश का पहला मामला है जिसमें अध्यादेश लाने के बाद राज्य सरकार ने इसे सदन में चर्चा के लिए रखा ही नहीं है। इससे संवैधानिक व्यवस्था को लेकर सवाल उठ खड़ा हुआ है।

पीएससी के विज्ञापन में आरक्षण है बाध्यकारी

वकील शर्मा ने संवैधानिक व्यवस्था का हवाला देते हुए कहा कि राज्य शासन द्वारा अध्यादेश की घोषणा के छह सप्ताह के भीतर विधानसभा के पटल पर रखना अनिवार्य है। वकील ने बताया कि 25 नवंबर को विधानसभा का सत्र आयोजित किया गया था। अध्यादेश को लेकर अगर छह सप्ताह की गणना करें तो राज्य लोक सेवा आयोग को अपने विज्ञापन में ईडब्ल्यूएस के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था करनी थी । नहीं करना संवैधानिक चूक है।

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