Bilaspur Column Campus Carner: कैंपस कार्नर कालम— रिपोर्टर धीरेंद्र सिन्हा।

स्कूल में छिपा है कोरोना

सरकारी आदेश के बाद स्कूलों में बच्चे पहुंचने लगे हैं। वहीं एक स्कूल में तीन छात्राओं के संक्रमित मिलने से हड़कंप मच गया है। इससे जो अभिभावक अब तक बच्चों को स्कूल भेजने के पक्षधर थे वे भी अब आनाकानी कर रहे हैं। वहीं अभिभावकों का एक वर्ग ऐसा भी है जो कह रहे हैं कि कोरोना स्कूल के भीतर छिपा है। अधिकारी भले ही दावा कर रहे हैं कि श्रमिकों के जाने के बाद जिन स्कूलों को क्वारंटाइन सेंटर बनाया गया था उन्हें संक्रमण मुक्त कर दिया गया है।

संक्रमण को लेकर विज्ञान भले कुछ भी कहे पर अभिभावकों का डर इसे स्वीकारने को तैयार नहीं है। इधर सरकारी स्कूलों के पास उतनी क्षमता नहीं है कि वे कोरोना से निपटने पुख्ता इंतजाम कर सकें। पर्याप्त मात्रा में सैनिटाइजर, मास्क, थर्मल स्क्रीनिंग तक नहीं है। जबकि कोरोना अभी खत्म नहीं हुआ बल्कि नए स्वरूप में इंतजार कर रहा है।

छात्र संघ चुनाव कब होगा

छात्र संघ चुनाव कब होगा इसका जवाब किसी के पास नहीं है। उच्च शिक्षा मंत्री भी चुप्पी साधे हुए हैं। छात्र संगठनों ने सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। प्रवेश और परीक्षा के बीच अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने काम भी शुरू कर दिया है। कालेज खुलने के साथ सियासी पारा भी चढ़ने लगा है। क्लासरूम और कैंटीन में रोजाना भीड़ जुट रही है। लेकिन नए शिक्षण सत्र में चुनाव होगा कि नहीं इसे लेकर कोई तैयारी नहीं है।

चुनाव बंद होने से युवाओं का ग्लैमर और लीडरशिप पर खासा असर हुआ है। राज्य में कांग्रेस की सरकार आने के बाद चुनाव की उम्मीद थी। लेकिन अब भी संभावना कम है। सरकार का कोई भी मंत्री स्पष्ट रूप से चुनाव कराने के मूड में नहीं है। निराश छात्र नेता अब राजनीतिक पार्टियों से तौबा करने की तैयारी में हैं। उनके मुताबिक नेतागीरी में अब करियर खत्म हो रहा है।

नए ड्राइवर ने बिगाड़ा खेल

न्यायधानी में एक विश्वविद्यालय को नया मुखिया मिलने के बाद विद्यार्थियों में खुशी की लहर है तो वहीं विवि प्रशासन में खलबली मच गई है। अधिकारियों की कुर्सी डगमगाने लगी है। क्योंकि अचानक एक दिन मुखिया को गेस्ट हाउस तक छोड़ने एक पुराना ड्राइवर चला गया। अधिकारियों को जब इसका पता चला तो वे झल्ला गए। क्योंकि उन्होंने पहले से एक हरिराम ड्राइवर तैयार कर रखा था। ताकि मुखिया की हर गतिविधि पर नजर रखी जा सके।

लेकिन उस ड्राइवर ने पूरा खेल बिगाड़ दिया। इसे लेकर अब अधिकारियों के बीच खींचतान चल रही है। दरअसल दिक्कत इस बात की है कि मुखिया को पुराना ड्राइवर पसंद आ गया है। इसलिए इस व्यवस्था में बदलाव करना अब आसान नहीं होगा। बहरहाल जो भी हो कहानी में आगे अब और मजा आएगा। जब कालेजों का निरीक्षण करने मुखिया निकलेंगे। मौसम ए बहार में अधिकारियों की करतूतों का कच्चा चिट्ठा खोलकर आएंगे।

छात्र बेहाल, प्राध्यापक हैं मस्त

एक बड़े राज्य विश्वविद्यालय के अकादमिक शिक्षण संस्थान में महीनों से पढ़ाई ठप है। विद्यार्थियों की उपस्थिति को लेकर केवल खानापूर्ति की जा रही है। आलम यह है कि नियमित प्राध्यापक मौज कर रहे हैं तो एडहाक वाले पसीना बहा रहे हैं। हैरानी की बात यह कि शोध और नवाचार के मामले में स्थिति चिंताजनक है। इस ओर किसी का ध्यान नहीं है।

एक प्राध्यापक रायगढ़ में अधिकारी बनने का सपना देख रहे हैं तो दूसरा जनसंपर्क में रहकर पढ़ाने से बचने की कोशिश में जुटे हैं। महिला प्राध्यापकों की छुट्टी से विद्यार्थी हलकान हैं। उनका भी माथा ठनक गया है। एक छात्र ने तो चिल्लाकर कह दिया कि युवाओं के भविष्य की कुछ तो चिंता करो। इधर छात्र बेहाल हैं और प्राध्यापक मुफ्त में वेतन लेकर मस्त हैं। पढ़ाई की चिंता न कोई एक्टिविटी। यूटीडी के नाम पर भरोसा उठ गया है। सुध लेने वाला भी कोई नहीं है।

Posted By: sandeep.yadav

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