बिलासपुर। बिलासपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी अटल श्रीवास्तव को झटका लगा है। बिलासपुर लोकसभा सीट से भाजपा के अरुण साव 1 लाख 41 हजार से ज्यादा की निर्णायक बढ़त ले चुके हैं। निर्णायक बढ़त मिलते ही अरुण साव के घर जश्न का माहौल बन गया है। बता दें कि छत्तीसगढ़ की बिलासपुर लोकसभा सीट के लिए तीसरे चरण में 23 अप्रैल को वोट डाले गए थे। इस सीट पर कुल 25 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे थे।

जीत के बाद अरुण साव ने कहा कि वे जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश करेंगे और क्षेत्र के विकास के लिए कोई कोर कसर बाकी नहीं रखेंगे।

यहां से कांग्रेस और भाजपा के अलावा बसपा के उत्तम दास गुरू गोसाई, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के नंद किशोर राज को चुनावी मैदान में उतारा है। बिलासपुर लोकसभा सीट भाजपा के लिए अभेद गढ़ रही है और भाजपा का 25 सालों से इस सीट पर कब्जा है।

वर्ष 1951 से लेकर वर्ष 2014 के चुनाव परिणाम पर गौर करें तो यहां प्रत्याशी की छवि को मतदाताओं ने बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं दिया। परंपरागत मतदाताओं के साथ स्वींग वोटरों की सहभागिता हमेशा से ही इस सीट पर दिखाई देती रही। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने लखनलाल साहू को अपना उम्मीदवार बनाया था। कांग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्री व भारत रत्न स्व.अटलबिहारी वाजपेयी की भतीजी करुणा शुक्ला को चुनाव मैदान में उतारा था। तब करुणा भाजपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता व उपाध्यक्ष पद छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुई थीं।

लखनलाल के सामने वह न केवल बड़ा नाम था साथ ही एक बड़ा चेहरा भी । मोदी लहर में करुणा जैसे दिग्गज नेत्री भी धराशायी हो गईं। एक लाख 76 हजार वोटों के अंतर से चुनाव हार गईं। मोदी लहर में मतदाताओं व्यक्ति की छवि की बजाय पार्टी को तवज्जो दिया और भाजपा के बेनाम चेहरे को जीताकर संसद भेज दिया।

वर्ष 1951 से 1991 तक इस सीट से अलग-अलग पार्टी के सांसदों ने लोकसभा में प्रतिनिधित्व किया। मसलन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय लोकदल, इंदिरा कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशी चुनाव जीतकर संसद पहुंचते रहे हैं। 40 साल तक यहां के मतदाताओं ने अलग-अलग पार्टी के प्रत्याशियों को चुनाव जीतकर न केवल राजनीतिक दल वरन जीतने वाले उम्मीदवार की कड़ी परीक्षा लेते रहे हैं। चार दशक एक बड़ा बदलाव आया।

दलित वोटों की रहती है अहम भूमिका

17 लाख 87 हजार 198 मतदाताओं वाले बिलासपुर संसदीय क्षेत्र में अनुसूचित जाति और जनजाति वोटर प्रभावी भूमिका में नजर आते हैं। अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या 3 लाख 35 हजार व अनुसूचित जनजाति वोटरों की संख्या 2 लाख 80 हजार के करीब है। मतदाताओं की राजनीतिक प्रतिबद्धता को देखें तो अनुसूचित जाति वर्ग के मतदाताओं की गिनती शुरूआती दौर में कांग्रेस के वोट बैंक के रूप में होती रही थी।

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Posted By: Sandeep Chourey