बिलासपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। हाई कोर्ट ने ब्रू काफी कंपनी को राहत देते हुए कंपनी के खिलाफ दायर परिवाद को खारिज कर दिया है। हाई कोर्ट ने माना है कि संविधान के अनुछेद 21 में व्यक्ति के जीने के अधिकार के साथ ही उसकी न्याय तक पहुंच भी शामिल है। खाद्य अधिकारी ने अमानक काफी बेचने पर कंपनी के खिलाफ परिवाद प्रस्तुत किया था।

काफी बनाने वाली कंपनी ब्रू ने वकील अभिषेक सिंहा के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। इसमें बताया गया कि खाद्य अधिकारी ने ब्रू कंपनी का सैंपल कराया और जांच में उसे अमानक पाया। इसके बाद उन्होंने कंपनी के खिलाफ कार्रवाई के लिए कोर्ट में परिवाद प्रस्तुत कर दिया। फिर जांच के लिए सैंपल भेजा गया। एक साल तक जांच चली और काफी अमानक पाया गया। याचिका में यह भी कहा गया है कि सैंपल लेने के एक साल बाद कंपनी का प्रिंटेड डेट एक्सपायरी हो गई। जबकि नियम यह है कि जिस पर आरोप लगा है वह उस सैंपल की रिपोर्ट को दूसरी सेंट्रल लैब में भी जांच करा सकता है। धारा 13(2) के अधिकार होने के बाद भी आरोपित को उससे वंचित होना पड़ा। अपने अधिकार से वंचित करने को लेकर कंपनी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी है। इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस संजय के अग्रवाल की एकलपीठ ने खाद्य अधिकारी के परिवाद को खारिज कर दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी माना है कि धारा 13(2) खाद्य अपमिश्रण अधिनियम 1956 में दिया गया प्रावधान बंधनकारी है। यदि खाद्य अधिकारी द्वारा इस अधिकार से आरोपित को वंचित किया जाता है तो उसे सजा नहीं दी जा सकती है। ऐसे में परिवाद जारी रखना न्याय की मंशा के विपरीत होगा।

Posted By: Nai Dunia News Network

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