बिलासपुर(नईदुनिया प्रतिनिधि)। जंगलों के बीच रहने में भरोसा करने वाले और अपने अंदाज में जीवन जीने वाले मरवाही के आदिवासी अब चाय बागान के बागबान बनेंगे। केंद्र सरकार की योजना के तहत मरवाही के सुदूर वनांचल में 150 एकड़ जमीन चिन्हांकित की गई है, जहां 50 आदिवासी परिवार चाय का बागान विकसित करेंगे। इस तरह प्रदेश में जशपुर के बाद मरवाही दूसरा ऐसा क्षेत्र होगा जहां चाय की खेती होगी। शुरुआत में जशुपर बागान के किसानों के अलावा उद्यानिकी व कृषि विभाग के अधिकारी प्रशिक्षित करेंगे। बागान जब विकसित हो जाएगा और तब इसे आदिवासियों के हवाले कर देंगे।

चाय बागान की महत्वाकांक्षी योजना

गौरेला पेंड्रा मरवाही जिले के ठाड़पथरा और आमानाला के 72 एकड़ जमीन को चाय बागान के लिए उपयुक्त माना है। इन जमीने का चिन्हाकंन करने कर लिया गया है। खास बात ये कि चाय की खेती आदिवासी करेंगे। आदिवासियों को स्वावलंबी बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने काम प्रारंभ कर दिया है। राज्य शासन के निर्देश पर वन विभाग ने जिला पंचायत को प्रस्ताव भेजा था। चाय बागान विकसित करने के लिए केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना को जरिया बनाया गया है।

रोजगार होगा उपलब्ध

मनरेगा फंड से 2.16 करोड़ स्र्पये स्वीकृत भी हो गया है। ठाड़पथरा व आमानाला की जमीन को चाय की खेती के लिए उपयुक्त माना गया है। चाय बागान विकसित करने के लिए आदिवासियों का चयन किया गया है। इसमें 72 किसानों की सूची बनाई गई है। कृषि के क्षेत्र में सहकारिता की भावना को लेकर साथ चलेंगे। चार वर्षीय योजना में प्रत्येक आदिवासी के लिए एक एकड़ का चाय बागान तैयार किया जाएगा। चाय बागान तैयार करने के लिए आदिवासी अपने स्वजनों के साथ यहां मजदूरी भी करेंगे। मनरेगा के तहत 100 दिन का रोजगार भी उपलब्ध कराएंगे।

भू जल संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य

ठाड़पथरा व आमानाला अमरकंटक की घाटी का क्षेत्र है। यह मरवाही वन मंडल के नक्शे में शामिल है। अरपा जलग्रहण क्षेत्र अंतर्गत आता है। चाय की खेती से भू जल संरक्षण व मिट्टी से अंत:सलीला अरपा नदी को पुनर्जीवन भी मिलेगा। चाय बागान विकसित होने के बाद चाय की पत्ती की तोड़ाई की जाएगी। पत्ती तोड़ाई का काम भी मनरेगा के तहत किया जाएगा।

योजना है कि बैगा आदिवासियों को किसी तरह का आर्थिक नुकसान उठाना न पड़े। इसके लिए चाय पत्ती की तोड़ाई करेंगे व मनरेगा के तहत भुगतान भी मिलेगा। बैगा आदिवासियों को प्रतिवर्ष 55 से 60 हजार स्र्पये आय प्राप्त होगी। बागान तैयार होने के बाद प्रसंस्करण केंद्र की स्थापना की जाएगी। इसके लिए बैगा किसानों की समिति बनाई जाएगी। बाजार उपलब्ध कराने का काम राज्य शासन द्वारा किया जाएगा।

जल संसाधन विभाग भी करेगा मदद

चाय बागान विकसित करने के लिए जल संसाधन विभाग द्वारा सिंचाई सुविधा के लिए 100 फीसद अनुदान उपलब्ध कराएगा। मालूम हो कि बागान विकसित करने के लिए तीन से चार वर्ष तक पानी की सिंचाई की जाती है। अक्षय ऊर्जा विभाग की योजना सौर ऊर्जा चलित सामुदायिक सिंचाई योजना पर जोर दिया जा रहा है।

Posted By: Manoj Kumar Tiwari

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