बिलासपुर। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने संगठन में जस्र्री फेरबदल किया है। इसका सीधा असर प्रदेश की कांग्रेस की राजनीति पर दिखाई दे रहा है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव व पूर्व नौकरशाह पीएल पुनिया की जगह पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा अब छत्तीसगढ़ कांग्रेस संगठन की बतौर प्रभारी काम करेंगे। प्रदेश प्रभारी में बदलाव का असर कांग्रेस की स्थानीय राजनीति में भी आने वाले दिनों में दिखाई देगा। खासतौर पर तब और जब वर्ष 2023 में प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। पुनिया से सीधेतौर पर राजनीतिक और व्यक्तिगत संपर्क बनाने वाले नेताओं के लिए कांगे्रेस अध्यक्ष का यह निर्णय सियासी झटके से कम नहीं है।

एआइसीसी महासचिव पुनिया वर्ष 2017 से छत्तीसगढ़ कांग्रेस संगठन के प्रभारी की हैसियत से काम कर रहे थे। राज्य में जब भाजपा की सरकार थी और कांग्रेस सत्ता में वापसी करने के लिए ताकत झोंक रही थी उस वक्त पीसीसी के अध्यक्ष की कमान भूपेश बघेल के हाथों में थी। बघेल के पीसीसी अध्यक्ष के कार्यकाल में पहले बीके हरिप्रसाद प्रदेश प्रभारी के रूप में काम कर रहे थे। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी से तल्खी और राजनीतिक रिश्ते में कड़वाहट के बाद आलाकमान ने उनकी जगह पुनिया को जिम्मेदारी सौंपी थी। पुनिया और बघेल की जुगलबंदी कहें या फिर आपसी राजनीतिक सामंजस्य वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में कांगेे्रस ने चमत्कारिक रूप से दो तिहाई से अधिक की बहुमत के साथ सरकार में वापसी की। राज्य में सरकार बनने के तकरीबन चार वर्ष तक पुनिया प्रदेश प्रभारी के पद पर काम करते रहे हैं। लंबे समय से छत्तीसगढ़ में काम करते रहने के कारण कांग्रेसजनों से उनके सीधे राजनीतिक रिश्ते बन गए थे। प्रदेश प्रभारी से सीधे राजनीतिक रिश्ते और जान पहचान का कांग्रेस के स्थानीय राजनीति में असर भी दिखाई देने लगा था। छत्तीसगढ़ में स्थानीय निकाय चुनाव में टिकट वितरण के दौरान पहली बार देखने को मिला जब पाषर््ादों के टिकट के साथ ही स्थानीय निकाय में अध्यक्ष पद की दावेदारी के दौरान राजनीतिक हस्तक्षेप दिखाई दिया था। बीते दो साल के दौरान बिलासपुर संभाग की कांग्रेस की राजनीति में सियासी हस्तक्षेप का दौर कुछ ज्यादा ही चला था। उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान स्थानीय नेताओं का एक समूह उत्तरप्रदेश में कैंपेनिंग करने के लिए गया था। पुनिया के बेटे के विधानसभा क्षेत्र में इनकी कैपेंनिंग भी चल रही थी। खास बात ये कि उत्तरप्रदेश के कुछ खास विधानसभा क्षेत्र में प्रचार करने वाले स्थानीय कांग्रेसी नेता इंटरनेट मीडिया के माध्यम से इसे प्रचारित कर रहे थे। इंटरनेट मीडिया के जरिए प्रचार का खास मकसद प्रदेश प्रभारी से अपने राजनीतिक ताल्लुकात को सार्वजनिक करना और स्थानीय राजनीति में अपना स्र्तबा कायम रखना माना जा रहा था। हो भी यही रहा था। पीसीसी के एक आला पदाधिकारी की माने तो पूर्व प्रदेश प्रभारी के नजदीकी कांग्रेस के नेता संगठन में अपनी अलग ही चला रहे थे। उस दौर में चर्चा तो इस बात की भी हो रही थी कि सत्ता और संगठन से अलग कांग्रेस में सामानांतरण शक्तिशाली गुट काम कर रहा है।

जो थे संपर्क में उनको लगा झटका

चर्चा तो इस बात की भी हो रही है कि राजनीतिक रिश्ते प्रगाढ़ करने वाले दिग्गज कांग्रेसी नेताओं के साथ ही विधानसभा चुनाव लड़ने के सपने देखने और इसे साकार करने वालों का करारा झटका लगा है। मजे की बात ये कि पुनिया के करीबी स्थानीय नेताओं ने तो बकायदा अपने लिए विधानसभा क्षेत्र भी चुन लिए थे। इनकी लाबिंग भी शुरू हो गई है। स्थानीय कार्यकर्ताओं और वोट बटोरने वाले नेताओं की पूछपरख भी बढ़ गई थी। प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी पद से पुनिया की राजनीतिक विदाई के बाद करीबियों का स्र्ख क्या होगा। सत्ता और संगठन में अब इनको राजनीतिक रूप से कितना महत्व मिलेगा यह देखने वाली बात होगी।

Posted By: Yogeshwar Sharma

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