Chhattisgarh High Court: राधाकिशन शर्मा.बिलासपुर(नईदुनिया)। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने आयकर विभाग से संबंधित एक प्रकरण की सुनवाई करते हुए कहा है कि अनुरोध के बावजूद सुनवाई न करना नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के विस्र्द्ध है। मामला आयकर विभाग से जुड़ा है, जिसमें उद्योगपति को नोटिस का जवाब देने का अवसर नहीं दिया गया। कोर्ट ने विवादित मूल्यांकन आदेश को रद किया है।

याचिकाकर्ता रश्मि लखोटिया इंडस्ट्रीय ग्रोथ सेंटर बोरई ने केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड, मुख्य आयकर आयुक्त छत्तीसगढ़, असेसमेंट यूनिट नेशनल फेसलेस सेंटर आयकर विभाग नई दिल्ली सहित स्थानीय अधिकारियों को प्रमुख पक्षकार बनाते हुए रिट याचिका दायर की है। इसमें आयकर अधिनियम, 1961 29 सितंबर 2022 की धारा 144 बी के साथ धारा 143 के तहत पारित मूल्यांकन आदेश को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने बताया है कि उन्हें आयकर विभाग ने 22 अप्रैल 2021 के नोटिस जारी कर टैक्स जमा करने के लिए कहा था। इसमें जवाब में उन्होंने अगले दिन 23 अप्रैल 2021 को व्यक्तिगत सुनवाई के लिए अवसर मांगा।

लेकिन उन्हें अपनी बात रखने का अवसर नहीं दिया गया है। इस संबंध में स्पष्ट कारण भी नहीं बताया। रिट याचिका की सुनवाई जस्टिस पी. सैम कोशी की सिंगल बेंच में हुई। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस कोशी ने विवादित मूल्यांकन आदेश 29 सितंबर 2022 को रद किया है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि प्राधिकरण याचिकाकर्ता की सुनवाई के बाद उचित निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होगा।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह कहा

ऐसे मामले में जहां ड्राफ्ट असेसमेंट आर्डर या फाइनल ड्राफ्ट असेसमेंट आर्डर या संशोधित ड्राफ्ट असेसमेंट आर्डर में बदलाव प्रस्तावित है, एक अवसर प्रदान किया जाता है। संबंधित को एक नोटिस भेजकर कारण बताने के लिए कहा जाता है। याचिकाकर्ता को उसके द्वारा अनुरोधित तारीख और समय पर कम से कम एक सप्ताह पहले सूचित किया जाना चाहिए।

Posted By: Abrak Akrosh

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