बिलासपुर। Chhattisgarh High Court News: देश के अन्य आदिवासी बाहुल्य राज्यों की तरह छत्तीसगढ़ में भी केंद्र सरकार द्वारा पारित पेसा कानून लागू करने की मांग को लेकर जनहित याचिका दायर की गई है। इस मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने राज्य शासन को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। केंद्र सरकार ने आदिवासी बाहुल्य राज्यों में इस वर्ग के विकास व उत्थान के लिए वर्ष 1996 में पेसा एक्ट पारित किया था।

इस कानून के तहत आदिवासी समुदाय के लोगों व उनके अधिकारों को सुरक्षित करने का प्रविधान तय किया गया है। इस अधिनियम में अनुसूचित क्षेत्र में रहने वाले लोगों को असीमित अधिकार भी दिया गया है। केंद्र ने इस अधिनियम को आदिवासी बाहुल्य राज्यों में लागू करने की छूट दी है। लेकिन छत्तीसगढ़ में इस पेसा कानून को लागू नहीं किया जा रहा है।

इसे लेकर बस्तर जिला निवासी खगेश ठाकुर ने अपने अधिवक्ता नीलकंठ मालवीय के माध्यम से हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। इसमें बताया गया कि पंचायतों और अनूसूचित क्षेत्रों से संबंधित को विस्तार देने के लिए बना पैसा अधिनियम देश के 10 राज्यों में लागू है। 2011 की जनगणना के अनुसार छत्तीसगढ़ में 42 जनजातियां हैं। इसके बाद भी यहां पेशा अधिनियम को लागू नहीं किया गया है।

याचिका में बताया गया है कि भारतीय संविधान के 73वें संशोधन में पंचायती राज अधिनियम को समाहित नहीं किए जाने पर 24 दिसंबर 1966 को पेसा अधिनियम लाया गया। इसमें प्रथागत संसाधनों, वनोपज, लघु खनिज, लघु जल निकायों सहित अन्य पर स्थानीय संस्थाओं का नियंत्रण दिया गया है। याचिका में यह भी बताया गया है कि तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात में पेसा नियम को लागू किया गया है। लेकिन ओडिशा, मध्य प्रदेश, झारखंड की तरह छत्तीसगढ़ में भी अभी तक इसे लागू नहीं किया गया है।

राज्य शासन या तो कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है या बहुत धीमे काम कर रहा है। याचिका में बताया गया है कि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र व ग्राम में उनकी मर्जी के बिना सरकारें खनिज की खदानें व उपलब्ध संसाधनों का दोहन कर रही हैं इससे आदिवासियों का शोषण हो रहा है। स्थानीय संस्थानों में भी इनकी सुनवाई नहीं है।

वन क्षेत्र सीमित हो गया है और आदिवासियों को रोजगार छीन गया है। इसलिए इस अधिनियम को लागू किया जाना आवश्यक है। गुुस्र्वार को इस प्रकरण की सुनवाई हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश प्रशांत मिश्रा की युगलपीठ में हुई। प्रारंभिक सुनवाई के बाद युगलपीठ ने शासन को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।

Posted By: Yogeshwar Sharma

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