सुविधा बंद पर नियम लाग

शिव सोनीColumn Red-Green Signal: जोनल स्टेशन में एक समय था जब प्लेटफार्म से लेकर कोई भी हिस्सा नहीं बचता था, जहां यात्रियों की चहल-पहल न रहती हो। एक अदृश्य वायरस ने स्टेशन की रौनकता को तहस-नहस कर दिया।

अब भले ही ट्रेनों का परिचालन शुरू होने से यात्रियों की मौजूदगी होने लगी है। हालांकि अभी भी कई हिस्से ऐसे हैं जो वायरस कीदस्तक की शुरुआती दिनों की याद दिला रहे हैं। इसकी झलक भी नजर आती है जिसे संक्रमण से बचाव के लिए अपनाया गया था।

इन्हीं में एक है दो गज दूरी बनाने के लिए की गई मार्किंग। गेट क्रमांक तीन पर पहुंचते ही लाल रंग की यह मार्किंग नजर आने लगती है। यह व्यवस्था आटोमेटिक टिकट वेंडिंग मशीन से टिकट निकालते समय दूरी बनाने के लिए की गई थी। मार्किंग लगाने के बाद रेल प्रशासन मशीन को चालू करना भूल गया। मसलन नियम लागू हुआ लेकिन सुविधा आज तक बंद ही रही।

मवेशी हांकने की मिली ड्यूटी

एक तस्वीर ने रेलवे के सफाई विभाग के कर्मचारियों की ड्यूटी ही बदल दी है। दरअसल उनके कार्य क्षेत्र में गाय ऐसी घूम रही थीं मानों वह चारागाह हो। बात जब अधिकारियों तक पहंुची तो वे बेहद नाराज हुए। उनकी कार्यशैली पर सवाल भी उठाया गया।

उनकी नाराजगी लाजिमी थी। इसलिए कर्मचारियों ने दोबारा शिकायत का मौका नहीं मिलने का आश्वासन दिया। दूसरे ही दिन कर्मचारियों की फौज सारा कामकाज दरकिनार कर मवेशी ढूंढने और उन्हें हांकने में जुट गई। इस दौरान उस द्वार की तलाश भी की गई जहां से मवेशियों की प्रतिबंधित क्षेत्र में एंट्री होती है।

इस बार उनके चेहरे पर निराशा नजर आई। दरअसल इस क्षेत्र में प्रवेश के एक या दो नहीं बल्कि चारों तरफ से द्वार हैं। इस परिस्थिति में मवेशियों को रोक पाना असंभव है। यह भी कहते नजर आए कि केवल 24 घंटे मवेशी हांकने की ड्यूटी नहीं दी जा सकती है।

बगावत करने की सजा बार-बार

रेलवे में कुछ महीने पहले एक छोटे अधिकारी की पदस्थापना को लेकर जमकर विरोध हुआ था। उन्हें हटाने कर्मचारी सड़क पर उतर आए। हालांकि उनकी मेहनत बेकार रही। अधिकारी की कुर्सी टस से मस नहीं हुई। उल्टा कर्मचारियों के चेहरे चिन्हाकित कर लिए गए।

कुछ दिनों बाद एक फरमान जारी हुआ। इसमें 35 कर्मचारियों का तबादला ऐसी जगह कर दिया गया जहां वे नहीं जाना चाहते थे। बाद में उन्हें यूनियन का साथ मिला और तत्काल प्रभाव से आदेश पर विराम लग गया। लेकिन मामला शांत होते ही दोबारा आदेश निकाला गया और सभी को नई जगह की जवाबदारी सौंप दी गई।

इस बार विरोध नहीं बल्कि कर्मचारियों ने बिना शोर किए ड्यूटी ज्वाइन कर ली। लेकिन, प्रशासन को यह रास नहीं आया और तीसरी बार उन्हीं कर्मचारियों को ऐसी जगह भेज दिया गया जहां रह पाना उनके लिए चुनौतीभरा है। शायद प्रशासन के खिलाफ बगावत करने की सजा है।

कहां गए तेज तर्रार साहब

रेलवे में कुछ साल पहले एक साहब का बिलासपुर में तबादला हुआ। पदभार संभालने के दूसरे दिन ही अलग पैठ जमाने के लिए ताबड़तोड़ कार्रवाई कराई। कर्मचारियों को समझाइश भी दी कि वे जब तक यहां हैं भ्रष्टाचार संभव नहीं होगा।

बेहतर होगा सभी कार्य करने का तरीका बदल लें। सबक सिखाने के लिए कारण बताओ नोटिस और तबादले की कार्रवाई भी की। इससे अमला थर्रा गया। सालभर तक यही स्थिति रही। अमला पूरी ईमानदारी के साथ कर्तव्यों का निर्वहन भी करता रहा। अब माहौल फिर से बदल गया है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि तेज तर्रार अधिकारी के रूप में छवि बनाने वाले का न तो कोई आदेश जारी हो रहा है और किसी कर्मचारी पर कार्रवाई की गाज गिर रही है। कहा जा रहा है कि उन्हें बड़े अफसरों ने ऐसेे कामों में उलझा दिया है कि कोई दूसरा काम करने की फुर्सत ही नहीं है।

Posted By: anil.kurrey

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