बिलासपुर। कोरिया जिले के जिला शिक्षाधिकारी के अजीबो-गरीब आदेश से परेशान व्याख्याता ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आदेश को रद करने और बड़े भाई द्वारा भरण पोषण के नाम पर किए जा रहे आर्थिक शोषण पर रोक लगाने की मांग की थी। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस आरसीएस सामंत ने जिला शिक्षाधिकारी के आदेश पर रोक लगा दी है। याचिकाकर्ता के बड़े भाई ने जिला शिक्षाधिकारी के पास अपने छोटे भाई से भरण पोषण के लिए राशि दिलाने की मांग की थी। जिस पर डीईओ ने याचिकाकर्ता व्याख्याता के वेतन से हर महीने सात हजार स्र्पये की राशि बड़े भाई को देने का निर्देश जारी कर दिया था। डीईओ के निर्देश पर विभाग द्वारा वेतन से पांच हजार स्र्पये काटकर भरण पोषण के नाम पर बड़े भाई के बैंक खाते में जमा करा दिया जाता था।

मनेंद्रगढ़ हायर सेकेंडरी स्कूल में पदस्थ व्याख्याता बलराज दास ने अधिवक्ता अजय श्रीवास्तव के जरिए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। दायर याचिका में कहा है कि पिता की मृत्यु वर्ष 1979 में हुई थी। पिता की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति के लिए विभागीय प्रक्रिया प्रारंभ हुई। उस वक्त बड़े भाई बलराम दास ने नौकरी करने से इन्कार कर दिया। याचिका के अनुसार बड़े भाई द्वारा इन्कार करने के बाद उसने पिता की जगह अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन जमा किया। पिता की जगह वर्ष 1994 में अनुकंपा नियुक्ति मिली।

वर्तमान में वह व्याख्याता के पद पर कार्यरत हैं। याचिकाकर्ता ने कहा कि इसी बीच बड़े भाई ने आर्थिक तंगी का हवाला देते हुए जिला शिक्षाधिकारी के पास भरण पोष्ाण की मांग करते हुए आवेदन पेश किया। बड़े भाई ने यह भी आरोप लगाया कि वह उसकी कोई आर्थिक मदद नहीं करता है। जिला शिक्षाधिकारी ने उसके वेतन से प्रति महीने पांच हजार स्र्पये और वर्ष 1994 से एरियर्स के रूप में दो हजार स्र्पये प्रति महीने की दर से वेतन कटौती कर दी और बड़े भाई को उक्त राशि प्रति महीने देने का आदेश जारी कर दिया।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अजय श्रीवास्तव ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता के बड़े भाई प्रारंभ से ही पिता के हिस्से की संपत्ति लेकर अलग हो गया है। याचिकाकर्ता द्वारा सरकारी नौकरी में रहते हुए अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन गंभीरता से किया जा रहा है। उसने अपनी तीन बहनों की शादी की और मां की सेवा भी की। समय-समय पर बड़े भाई को आर्थिक मदद भी करते आ रहा है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि जिला शिक्षाधिकारी ने अपने अधिकारों का दुस्र्पयोग करते हुए असंवैधानिक आदेश जारी कर दिया है। अनुकंपा नियुक्ति सशर्त नहीं दी जाती है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सामंत ने जिला शिक्षाधिकारी के आदेश को रद कर दिया है।

एरियर्स के रूप में वेतन कटौती

जिला शिक्षाधिकारी ने एक और अजीबो गरीब आदेश जारी किया। पिता की मृत्यु के बाद याचिकाकर्ता को वर्ष 1994 में अनुकंपा नियुक्ति मिली। तब से लेकर एरियर्स के रूप में बड़े भाई को उनके वेतन से प्रति महीने दो हजार स्र्पये अलग कटौती की जा रही थी। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता श्रीवास्तव ने कोर्ट को जब इस तरह के अजीबो गरीब आदेश की जानकारी दी तो कोर्ट भी अचरज में पड़ गया। कोर्ट ने डीईओ के दोनों ही आदेश को खारिज कर दिया है।

Posted By: Yogeshwar Sharma

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