राधाकिशन शर्मा, बिलासपुर नईदुनिया। ये गांव है वीर जवानों का अलबेलों का मस्तानों का, इस गांव का यारों क्या कहना... जांजगीर-चांपा जिले के नक्शे पर एक गांव किरीत है जहां की माटी वीर सपूतों को जन्म देती है। यहां ऐसा कोई घर नहीं है जहां के युवा फौज में न हो। यहां के युवाओं में देशप्रेम की भावना कूटकूट कर भरी हुई है। वर्तमान में 250 से अधिक युवा थल सेना में अलग-अलग पदों पर रहते हुए सीमा पर तैनात हैं। गांव के युवाओं में फौज में भर्ती होने का सिलसिला आज से साढ़े तीन दशक पहले शुरू हुआ था।

6 जून 1985 को सबसे पहले गांव के युवा ध्यानचंद्र चंद्रा की थल सेना में भर्ती हुई थी। ध्यानचंद्र को तब इस बात का जरा भी अंदाज नहीं था कि युवाओं में देशप्रेम का उनके द्वारा जगाया जज्बा इतना प्रभावी होगा कि किरीत का नाम पूरे छत्तीसगढ़ में अदब से लिया जाएगा। प्रदेश का यह पहला गांव है जहां इतनी बड़ी संख्या में युवा देश सेवा कर रहे हैं। देशसेवा की दीवानगी यहां के युवाओं में कुछ ऐसी है कि दिन रात हाड़तोड़ मेहनत करते हैं। सुबह से लेकर शाम तक 10 से 20 किलोमीटर की दौड़ लगाते युवाओं को देखा जा सकता है।

खास बात ये कि युवाओं से ज्यादा यहां के ग्रामीण व महिलाएं अपनी माटी से प्रेम करती हैं। तभी तो अपने बच्चों के लिए गांव में ही 15 एकड़ भूखंड को मैदान में तब्दील कर दिया है। यहां गांव के युवाओं के अलावा लड़कियां भी हिस्सा निभाती हैं।

विशेष सेवा मेडल से नवाजे गए थे राणा : वीरों की भूमि में पैदा होने वाले सपूतों ने दुश्मनों से भी जमकर लोहा लिया है। ऐसे ही एक योद्धा हैं महेंद्र प्रताप सिंह राणा। अपने सेवकाल के दौरान राणा ने हर मोर्चे पर बहादुरी का परिचय दिया। उनको मिले सेवा मेडल इस के गवाह हैं। विशेष सेवा मंडल के अलावा ऑपरेशन विजय, ऑपरेशन पराक्रम, ऊंचा तुंगा, स्वर्ण जयंती पदक, दीर्घ सेवा मेडल, थल सेना और एकीकृत सेनाध्यक्ष ने उन्हें विशेष सम्मान से सम्मानित किया है।

देशभक्ति की ऐसी मिसाल नहीं दिखती

किरीत से लगा गांव है ग्राम भैंसदा। यहां के तीन सगे भाई फौज में हैं। विश्वनाथ क्षत्री के चार बेटों में तीन बेटे सेना में कार्यरत हैं। सूरज सिंह, राकेश सिंह व रुपेश सिंह। इनमें से रुपेश सिंह श्रीनगर में तैनात हैं और आंतकी गतिविधियों से जमकर लोहा ले रहे हैं।