धीरेंद्र सिन्हा.बिलासपुर(नईदुनिया)। स्कूल में पढ़ने वाले लाखों बच्चे पेंसिल छीलकर उसका कचरा यूं ही फेंक देते हैं। सोचिए, अगर फेंके गए उन पेंसिल के छिलकों से छोटे-छोटे औषधीय पौधे निकल आए, तो कैसा लगेगा। बिलासपुर की 13 साल एक बच्ची ने पर्यावरण बचाने के लिए ऐसा ही एक नवाचार किया है। यह नवाचार सिर्फ सोच तक सीमित नहीं है, बल्कि एक कंपनी ऐसी पेंसिल बनाने जा रही है। यूएन ने भी इस प्रोजेक्ट को चयनित किया है।

कक्षा आठवीं की छात्रा अमिताशा सोनी ने वैज्ञानिक सोच के बल पर विश्व स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। 13 साल की उम्र में कागज की लुग्दी से पेंसिल का निर्माण किया है। इतना ही नहीं, इसमें औषधीय पौधों के बीज भी हैं। पेंसिल को शार्पनर से छीलने पर निकला छिलका जमीन पर फेंका गया तो तुलसी और दौना के औषधीय पौधे उग जाएंगे। अमिताशा के इस प्रोजेक्ट का यूएन(यूनाइटेड नेशंस) के संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अंतर्गत एसडीजीएस(सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स चैंपियन) में चयन किया है। भारत से केवल दो बेटियों के प्रोजेक्ट को जूनियर वर्ग में चयनित किया गया है।

उनमें से दूसरी केरल के त्रिचुर की रहने वाली के. लावण्या है। पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की दिशा में अमिताशा के नवाचार की खूब सराहना हो रही है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 17 लक्ष्य निर्धारित हैं। इसके अंतर्गत चयन हुआ है। जलवायु क्रिया(क्लाइमेट एक्शन) पर अमिताशा विगत दो वर्षों से इस प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी। बच्चों में विज्ञान के प्रति अभिरुचि जगाने का काम करने वाली शहर की संस्था नेचर बाडी के प्रमुख पानू हालदर का भी मार्गदर्शन मिला। इनके माध्यम से एसडीजीएस में आवेदन की प्रक्रिया को पूरा किया। 10 नवंबर को चयन को लेकर ईमेल पहुंचा।

दादी की कहानियों से मिली प्रेरणा

दिल्ली पब्लिक स्कूल बिलासपुर में अध्ययनरत अमिताशा के नवाचार में दादी आशा सोनी का सबसे बड़ा योगदान है। रोजाना रात में सोने से पहले दादी विज्ञान के अलग-अलग रहस्यों के बारे में बतातीं। कहानी सुनातीं। दादा राम कुमार सोनी भी उसे पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के खतरे पर जानकारी देते। यहीं से उसके मन में जलवायु को लेकर कुछ नया करने का विचार आया। पिता डा. अमित सोनी, माता डा. नताशा सोनी सहित पूरा परिवार बिटिया के इस उपलब्धि से गदगद है।

प्लास्टिक के प्लेट व ग्लास के विकल्प पर भी शोध

पेसिंल का प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद अमिताशा अब शादी-पार्टियों में इस्तेमाल के बाद फेंके जाने वाले प्लास्टिक के प्लेट व ग्लास के विकल्प पर शोध कर रही है। वह ऐसा प्लेट तैयार कर रही है, जो पर्यावरण के लिए बिल्कुल भी नुकसानदायक ना हो। इस पर उनका काम अंतिम चरण में है। फिलहाल इसे लेकर कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं करना चाहती।

पेसिंल में बड़े वृक्षों के बीज को मिलाने का लक्ष्य

पेसिंल में अभी औषधीय पौधों के बिल्कुल छोटे बीजों को डाला गया है। अमिताशा की मानें तो बहुत जल्द आम, नीम, पीपल जैसे बड़े वृक्षों के बीज पेसिंल के भीतर होंगे। वर्तमान में भले ही संभव ना हो लेकिन भविष्य में यह सच्चाई होगी। इस लक्ष्य को एसडीजीएस के साथ मिलकर दो वर्ष के भीतर पूरा किया जाएगा।

विज्ञान में जबरदस्त रुचि

अमिताशा के परिवार के अनुसार उसे विज्ञान में काफी रुचि है। घर के कमरों से लेकर रसोई और गार्डन में प्रयोग करती रहती है। नेचर बाडी की सक्रिय सदस्य होने के कारण आए दिन नए-नए प्रोजेक्ट का प्रदर्शन भी करती है। प्रोजेक्ट का वैश्विक स्तर पर चयन होने के बाद उसके हौसले और बुलंद हैं। वह जलवायु परिर्वतन के क्षेत्र में काम करना चाहती है और उन बधाों के साथ जुड़ना चाहती हैं, जो इस बारे में सोच रहे हैं। यूएन के जरिये उन्हें यह मौका मिल सकता है।

दिल्ली की कंपनी से हुआ है पेंसिल निर्माण का समझौता

परिवार के सदस्यों ने यह भी बताया कि प्रोजेक्ट के चयन के बाद अब दिल्ली के एक कंपनी के साथ समझौता हुआ है। कंपनी ऐसी पेंसिल का उत्पादन करेगी। पेसिंल के भीतर औषधीय पौधों के बीज सेट किए जाएंगे। टूटने पर पेंसिल को कहीं फेंक दिया गया तो वहां पौधे उग आएंगे। वह कहते हैं यह प्रयोग संभवत: बहुत से लोगों ने किया होगा, लेकिन व्यवसायिक तौर पर इसे बाजार में लाने की पहल अनूठी है।

Posted By: Abrak Akrosh

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