बिलासपुर। हसदेव के जंगल को बचाने के लिए तेज वर्षा में भी आंदोलन जारी है। जब तक सरकार अपनी फैसला वापस नहीं ले लेती तब तक आंदोलन वापस नहीं होने की बात कही जा रही है। बीते 40 दिनों से लगातार आंदोलन जारी है। हालांकि अभी सरकार की ओर से आंदोलनकारियों के पास कोई प्रतिनिधि नहीं पहुंचे हैं।

बीते कुछ दिनों से जिले में लगातार वर्षा हो रही है। गुरुवार को भी आसमान में घटा छाई है। इसके बावजूद आंदोलनकारियों के हौसले बुलंद हैं। आंदोनकारी निलोत्मा शुक्ला का कहना है कि जब तक हसदेव जंगल को काटने के आदेश को सरकार वापस नहीं ले लेती है, तब तक आंदोलन खत्म नहीं होगा। देश में करीब तीन लाख मिलियन टन से अधिक कोयला उपलब्ध है।

उनमें से सिर्फ 15 प्रतिशत कोयला घने जंगलों के नीचे है। देश के भंडारण का केवल दो प्रतिशत ही हसदेव जंगल के नीचे कोयला है। बाकी कोयला खुली जगहों पर है। इसके बावजूद सरकार हसदेव के जंगल को बर्बाद करने में उतारू हो रही है। सरकार हमारे जंगलों को काटकर हसदेव और पूरे छत्तीसगढ़ के पर्यावरण व वातावरण को बर्बाद करना चाहती है। सरकार के इस फैसले का विराध करते हैं।

डा. मनीष बुधिया ने हसदेव जंगल के महत्व के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि सरकार जो ग्रीन एनर्जी रिन्यूएबल एनर्जी के उपर भी बेहतर तरीके से काम कर सकती है। जंगल को काटने की आवश्यकता नहीं है। पेड़-पौंधों को कटने से बचाया जा सकता है। धीरे-धीरे जंगल खत्म होते जा रहा है। यही वजह है कि प्रत्येक साल गर्मी के मौसम में प्रकृति हमे पेड़-पौधों का अहसास करवाती है।

इसके बावजूद अगर हम समय रहते नहीं सुधार करते हैं तो भविष्य में बहुत भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। इस दौरान आंदोलन में रतिश श्रीवास्तव, राजेश खरे, अमित वासुदेव, श्रेयांश बुधिया, मनोज शुक्ला, पवन पांडे, डा. मनीष बुधिया, चंद्र प्रदीप बाजपेई, संजय आयल सिंघानी, साकेत तिवारी समेत अन्य लोग उपस्थित थे।

Posted By: Yogeshwar Sharma

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