बिलासपुर। निचली अदालत से आजीवन कारावास की सजा प्राप्त अपीलार्थी को हाई कोर्ट ने बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई खुद को निर्दोष साबित न कर पाए तो भी उसे आरोपित नहीं बना सकते। दरअसल, कांकेर जिले के एक गांव में एक महिला की लाश फंदे पर लटकी मिली थी। कमरा अंदर से बंद था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला घोटने से मौत के लक्षण पाए गए थे। इसके अलावा कोई साक्ष्य या प्रत्यक्षदर्शी नहीं था।

निचली अदालत ने पति अनंत को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस पर अनंत ने हाई कोर्ट में अपील पेश की। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट के समक्ष बताया गया कि आरोपित और उसके बच्चों से पुलिस ने पूछताछ नहीं की है। कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 106 के प्रविधान के तहत अनंत के पक्ष में फैसला सुनाया है। याचिकाकर्ता बीते चार वर्ष से रायपुर सेंट्रल जेल में बंद है और आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। हाई कोर्ट ने तत्काल रिहाई का आदेश जारी किया है।

विचारण न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता अनंत दत्ता ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में अपील की थी। याचिकाकर्ता ने कहा कि पुलिस द्वारा बिना किसी ठोस सबूत के हत्या का जुर्म दर्ज कर दिया है। विचारण न्यायालय ने पुलिस डायरी और विवेचना के आधार पर सजा सुना दी है। सात मई 2012 की दोपहर तीन बजे उसकी पत्नी ने कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। जिस कमरे में फांसी लगाई थी, उसे भीतर से बंद कर दिया था। पुलिस ने पत्नी को ही आरोपित बताते हुए अपरार्ध दर्ज कर लिया है। अपराध दर्ज करने से पहले उसकी और उसके तीन बच्चों का बयान भी दर्ज नहीं किया है। घटना के वक्त बच्चे भी घर में ही थे। सिर्फ संदेह के आधार पर उसे आरोपित बना दिया है। मामले की सुनवाई जस्टिस संजय एस. अग्रवाल व संजय के. अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई।

डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है कि अभियोजन पक्ष ने कोई सबूत नहीं दिया है कि याचिकाकर्ता ने अपराध किया है। कमरा अंदर से बंद पाया गया था, जिसे जांच अधिकारी ने स्वीकार किया है। पुलिस के गवाहों ने न्यायालय में अपने पूर्व के बयान को गलत बताया है। जिहाजा पुलिस पंचनामा को साबित नहीं कर पाई है। डिवीजन बेंच ने कहा कि यह भी स्पष्ट नहीं है कि याचिकाकर्ता ने ही अपराध किया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि केवल भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 106 में निहित प्रविधान के आधार पर याचिकाकर्ता को अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करने पर धारा 106 की सहायता से दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अपीलकर्ता अपने तीन बच्चों के साथ रह रहा था। अभियोजन पक्ष ने ना तो तीन बच्चों और न ही याचिकाकर्ता से पूछताछ की है।

इस आधार पर लिया निर्णय

हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष से यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता और उसकी पत्नी अकेले घर में नहीं रह रहे थे। उनके तीन बच्चे भी साथ रहते थे। उनमें से किसी का भी अभियोजन द्वारा परीक्षण नहीं किया गया है। वे घटना पर कुछ प्रकाश डालने के लिए गवाह हो सकते थे। हालांकि विचारण न्यायालय ने एक निष्कर्ष दर्ज किया है कि विचाराधीन कमरा अंदर से बंद था। लेकिन न्यायालय के समक्ष बयान में विवेचना अधिकारी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जिस कमरे में महिला ने फांसी लगाई थी, वह खुला हुआ था।

डिवीजन बेंच ने कहा कि यह भी स्थापित नहीं होता है कि दरवाजे को अंदर से बंद किया गया था और याचिकाकर्ता वेंटिलेटर से बाहर चला गया था। पुलिस रिकार्ड में इस बात का कोई सबूत नहीं है कि याचिकाकर्ता को उस जगह से भागते देखा गया हो। भादवि की धारा 302 के तहत याचिकाकर्ता को अपराध के लिए दोषी ठहराने का आधार नहीं हो सकता है।

Posted By: Abrak Akrosh

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