बिलासपुर। हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस अरुप गोस्वामी और जस्टिस गौतम भादुड़ी की खंडपीठ में रायपुर और बिलासपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड के गठन और कार्यों को संविधान विरोधी बताने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। केंद्र सरकार की ओर एएसजी रमाकांत मिश्रा द्वारा प्रस्तुत जवाब में यह माना गया कि ये दोनों कंपनियां उन्हीं कार्यों को अंजाम दे सकती हंै, जिसकी अनुमति नगर निगम से मिली हो। साथ ही इन कंपनियों के निदेशक मंडल में राज्य सरकार और नगर निगम के बराबर-बराबर प्रतिनिधि होने चाहिए। वर्तमान में इन दोनों कंपनियों के 12 सदस्यीय निदेशक मंडल में नगर निगम आयुक्त के अलावा कोई भी नगर निगम का प्रतिनिधि नहीं है।

अधिवक्ता विनय दुबे की ओर से अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव और गुंजन तिवारी द्वारा दाखिल जनहित याचिका में बिलासपुर और रायपुर नगर में कार्यरत स्मार्ट सिटी लिमिटेड कंपनियों को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि इन्होंने निर्वाचित नगर निगमों के सभी अधिकारों और क्रियाकलाप का असंवैधानिक रूप से अधिग्रहण कर लिया है। जबकि ये सभी कंपनियों विकास के वही कार्य कर रही हंै जो संविधान के तहत संचालित प्रजातांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित नगर निगमों के अधीन है।

विगत पांच वर्षों में कराए गए कार्य की प्रशासनिक या वित्तीय अनुमति नगर निगम मेयर, मेयर इन कौंसिल या सामान्य सभा से नहीं ली गई है। गुरुवार को हुई सुनवाई में रायपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड की ओर से अधिवक्ता प्रफुल्ल भारत ने अतिरिक्त दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए समय मांगा। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने यह कहकर आपत्ति की है कि कंपनी तीन महीने पहले जवाब प्रस्तुत कर चुकी है। इस पर हाई कोर्ट ने 30 नवंबर तक समय कंपनी को दिया है। वहीं 10 दिन के भीतर याचिकाकर्ता यदि प्रतिउत्तर प्रस्तुत करना चाहे तो कर सकता है। बिलासपुर स्मार्ट सिटी की ओर से अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी पैरवी कर रहे हंै। प्रकरण में अगली सुनवाई 14 दिसंबर को तय की गई है। इस दिन मामले पर अंतिम बहस होने की संभावना है।

Posted By: Yogeshwar Sharma

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