बिलासपुर। जिला आयुर्वेदिक महाविद्यालय में 80 प्रतिशत दवाओं की कमी हो गई है। यही हाल प्रदेश के हर आयुर्वेदिक चिकित्सालय का है। कोरोना काल के बाद आयुर्वेदिक दवाओं की मांग बढ़ी है। लेकिन, इसके अनुरूप दवाएं बनाने के लिए आवश्यक जड़ी-बूटियां ही नहीं मिल पा रही हैं। कारण यह कि घने जंगलों में इन जड़ी-बूटियों की पहचान रखकर खोजने वाले लोग कम हो गए हैं। वहीं जंगलों में इनका उत्पादन भी कम हुआ है। ऐसे में विभिन्न् प्रकार की आयुर्वेदिक दवाओं की कमी से जूझना पड़ रहा है।

प्रदेश के आयुर्वेदिक चिकित्सालयों में सीजीएमएससी (छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन लिमिटेड) से दवाओं की आपूर्ति की जाती है। सीजीएमएससी भी रायपुर स्थित मुख्य आयुर्वेदिक फार्मेसी से दवा लेता है। वहां पर उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और ओडिशा के जंगलों में मिलने वाली जड़ी-बूटियों से दवा बनती है। लेकिन, बीते छह माह से इन प्रदेशों से मांग के अनुरूप जड़ी-बूटियों की सप्लाई नहीं हो पा रही है। वजह यह है कि जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगने वाली जड़ी-बूटियों का उत्पादन धीरे-धीरे कम होने लगा है। ऐसे में मांग के अनुरूप जड़ी-बूटियां नहीं मिल पा रही है।

दूसरी वजह यह भी ऐसी दुर्लभ जड़ी-बूटियों की पहचान करने वाले लोग भी कम हो गए हैं, क्योंकि ऐसे लोगों की उम्र बढ़ने से अब वे जंगल जाना भी बंद करने लगे हैं। जिला आयुर्वेद अधिकारी डा. रक्षपाल गुप्ता का कहना है कि इसका सीधा असर अब आयुर्वेदिक चिकित्सालयों औषधालयों पर पड़ रहा है। मरीज तो इलाज कराने के लिए पहुंच रहे हैं, लेकिन इसके बाद अधिकांश बीमारियों की दवा उन्हें नहीं मिल पा रही है। यदि मांग के अनुरूप जड़ी-बूटियां नहीं मिलीं तो आने वाले दिनों में यह संकट और भी बढ़ेगा।

इन मुख्य दवाओं की है कमी

जड़ी-बूटियेां का उत्पादन कम होने से महाविद्यालय में मुख्य रूप से आशोक चूर्ण, आर्थोनव क्रीम, कामदूधा रस, श्वेत परपट्टी, वातिना तेल, आर्थोविम टैब, त्रिशोधक सीरप, आयुष क्वाथ जैसे दवाओं के साथ लगभग 80 से ज्यादा प्रकार की दवा की कमी बनी हुई है। इसकी वजह से उदर रोग, बवासीर, हड्डियों से संबंधित बीमारी, लकवा, रक्तचाप, मधुमेह जैसी बीमारियों का इलाज प्रभावित हो रहा है।

संजीवनी केंद्र बने सहारा

दवाओं की कमी को देखते हुए आसपास के वन क्षेत्र में मिलने वाली जड़ी-बूटियों का सहारा लिया जा रहा है। इसके लिए वन विभाग के संजीवनी केंद्र से अनुबंध कर कुछ मात्रा में उनके द्वारा बनाई गई दवाओं का उपयोग किया जा रहा है। लेकिन यह नाकाफी साबित हो रही है।

Posted By: Yogeshwar Sharma

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