शिव सोनी, बिलासपुर। Red-Green Signal: कोरोना की दूसरी लहर की दस्तक के साथ स्वास्थ्य महकमा सतर्क हो गया। सबसे ज्यादा खतरा ट्रेन से पहुंचने वाले यात्रियों से था। इसलिए महकमे ने पहले यहीं ध्यान दिया। बड़ा अमला स्टेशन में पूरी योजना बनाकर तैनात हो गया। उद्देश्य यह था कि एक भी यात्री बिना जांच के बाहर नहीं जाने पाए। शुरुआती दिनों में दिक्कत भी आई। यात्रियों की भीड़ संभाल पाना मुश्किल था। पर बाद में रेलवे से सहयोग मिला और जांच होने लगी। भीड़ ऐसी कि सुस्ता भी नहीं पाते थे। तब यात्री खतरों के बीच यात्रा कर रहे थे। पर जब सतर्क हुए तो अपने आप ट्रेन में संख्या कम होती गई। अब दिनभर में बमुश्किल 100 यात्री पहुंचते हैं। वह भी घंटों के अंतराल में। इससे स्वास्थ्यकर्मियों को राहत मिली है। एक या दो कर्मचारी सभी यात्रियों की जांच पूरी कर ले रहे हैं। वह चाह रहे हैं कि स्थिति इसी तरह रहे।

नए साहब ने जीता मन

सुरक्षा विभाग में एक नए साहब ने कमान संभाली है। कुर्सी पर विराजमान होते ही उन्होंने उन विभागों के अधिकारी व कर्मचारियों के बीच जगह बना ली, जिनके साथ पहले कभी पटरी नहीं बैठती थी। दरअसल साहब ने बारी-बारी इन विभागों में उपस्थित दर्ज कराई और यह विश्वास दिलाया कि विभाग उनकी और रेल संपत्ति की सुरक्षा के लिए है। इसलिए जब कभी आवश्यकता पड़े तत्काल उनसे सीधे संपर्क करें। इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ जब इस विभाग के साहब खुद जाकर मिले हों। पहली बार में अधिकारी व कर्मचारियों का मन जीत लिया। इसे अब तक बरकरार रखे हुए हैं। बीच-बीच में फोन घनघनाकर हालचाल भी जानते हैं। उनका यह स्टाइल सभी को पसंद आया। आते ही कुछ विभागों की जटिल समस्याओं का भी समाधान साहब ने पल भर में कर दिया है। स्थिति यह है कि वे नए साहब की प्रशंसा करने से नहीं थक रहे हैं।

प्रभारी बनने का सपना साकार

वैसे तो विभाग छोटा है। पर काम की जिम्मेदारियां इतनी बड़ी-बड़ी हैं कि हर कोई बास बनना चाहता है। एक साहब का भी यही हाल है। वे सालों से प्रभारी बनने का सपना देख रहे थे। पर मुख्यालय में छवि ठीक नहीं होने के कारण मौका ही नहीं मिल पाया। एक बड़े साहब का तबादला हुआ तो दूसरे को कुर्सी में बैठा दिया गया। इसकी वजह से उन्हें झटका भी लगा था। जब-जब कार्यालय पहुंचते नए साहब की बुराई कर उन्हें नकारा साबित करने में कसर नहीं छोड़ते थे। तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें प्रभारी की जवाबदारी नहीं मिली। पर अदृश्य वायरस ने उन्हें यह तोहफा दे दिया। दरअसल प्रभारी साहब भी संक्रमण की चपेट में आए। लिहाजा न चाहते हुए भी साहब को कार्यभार संभालने को कहना पड़ा। इससे वे गदगद हैं। हालांकि जिस वायरस ने उन्हें मौका दिया, वही साहब को प्रतिभा दिखाने से भी रोक रहा है।

इंतजार दो घंटे कटौती का

रेलवे के एक विभाग के कर्मचारियों को ड्यूटी में दो घंटे कटौती का इंतजार है। दरअसल कोरोना की वजह से आंगुतकों की संख्या बेहद घट गई है। दिन में तो कुछ आंगुतकों की मौजूदगी हो भी जाती है पर शाम ढलते ही उनकी हालत देखते लायक रहती है। स्थिति जब सामान्य थी तब अमले को ड्यूटी का समय कब खत्म हो गया पता नहीं चलता था। पर अब बिना काम कुर्सी भी काटती है। उच्चाधिकारी भी यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि शाम ढलने के बाद उनके पास कोई काम नहीं रह जाता। इसके बावजूद नियमों में ढील नहीं दे रहे हैं। जबकि दूसरी जगहों पर इसी विभाग के कामकाज की अवधि दो घंटे कम कर दी गई है। बेचारे कर्मचारी इस अव्यवस्था से परेशान हैं। पर प्रशासन के सामने बगावत करने किसी में हिम्मत नहीं है। कर्मचारियों के हित में आवाज उठाने वाला यूनियन भी नहीं देख रही।

Posted By: Yogeshwar Sharma

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