बिलासपुर । नईदुनिया प्रतिनिधि। Reservation in promotion पदोन्नति में आरक्षण देने के शासन के निर्णय के खिलाफ दायर याचिका पर हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच में सुनवाई हुई । सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने राज्य शासन द्वारा नियम बनाते वक्त सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं किए जाने का खुलासा कोर्ट के समक्ष किया। राज्य शासन के वकील ने अफसरों द्वारा निर्देशों का पालन किए बिना निर्देश जारी करने की बात कही। साथ ही नियमावली में चूक की बात को स्वीकार करते हुए त्रुटियों को सुधारने के लिए मोहलत मांगी । हाई कोर्ट ने समय देते हुए अगली सुनवाई के लिए नौ दिसंबर की तिथि तय कर दी है।

पदोन्नति में आरक्षण के प्रावानों को चुनौती देने वाली याचिका पर राज्य सरकार ने हाई कोर्ट में स्वीकार किया है कि नियम बनाते वक्त समय-समय पर विभिन्न् याचिकाओं की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों का ध्यान नहीं रखा गया।

राज्य सरकार ने प्रमोशन में आरक्षण का प्रावधान घोषित किया था। 22 अक्टूबर 2019 को राज्य सरकार ने एक आदेश जारी कर पदोन्नति में आरक्षण नीति के तहत अनुसूचित जाति वर्ग के लिए 13 फीसदी और अनुसूचित जनजातिवर्ग के लिए 32 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया था। शासन के इस निर्णय के खिलाफ विष्णु तिवारी और गोपाल सोनी ने अपने वकील के जरिए हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी थी।

याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर रिट याचिका पर सोमवार को चीफ जस्टिस पीआर रामचंद्र मेनन और जस्टिस पीपी साहू के डिवीजन बेंच में सुनवाई हुई याचिकाकर्ताओं के वकील प्रफुल्ल भारत और विवेक शर्मा ने पैरवी करते हुए कहा कि राज्य सरकार का यह आदेश हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों के विपरीत है।

हाई कोर्ट छत्तीसगढ़ ने शरद श्रीवास्तव विरुद्ध छत्तीसगढ़ विद्युत मंडल के प्रकरण में चार फरवरी 2019 को प्रमोशन के आदेश को असंवैधानिक माना था। वहीं सुप्रीम कोर्ट में इसी मुद्दे को लेकर जनरैल सिंह ने याचिका दायर की थी। जिसमें सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने पदोन्नति में आरक्षण को गलत ठहराया था। साथ ही टिप्पणी की थी कि क्रीमीलेयर को आरक्षण का फायदा नहीं दिया जा सकता।

याचिकाकर्ता के वकीलों द्वारा रखे गए तर्क के बाद राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए महाविक्ता कार्यालय के लॉ अफसरों ने डिवीजन बेंच के समक्ष भूल स्वीकारी और कहा कि अधिकारियों ने हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों का अध्ययन किए बिना ही नियम बना दिया है। चूक को सुधारने के लिए लॉ अफसरों ने हाई कोर्ट से एक सप्ताह का समय मांग। महाविक्ता कार्यालय के लॉ अफसरों के आवेदन को स्वीकार करते हुए डिवीजन बेंच ने अगली सुनवाई के लिए नौ दिसंबर की तिथि तय कर दी है।

Posted By: Hemant Upadhyay