बिलासपुर। Bilaspur News: दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे तोरवा स्थित मुक्तिधाम। जहां जाने के लिए अच्छे-अच्छों को सोचना पड़ता है। यहां दिन और रात पांच युवाओं की टीम लगातार कोरोना संक्रमित मृतकों को मुक्ति दिलाने का काम कर रहे हैं। इनकी हिम्मत की दाद देनी होगी। स्वजनों को अंतिम संस्कार में पूरे मन और लगन के साथ सहयोग भी कर रहे हैं। मन में लगन और जजबा ऐसा कि भीष्ाण गर्मी हो या फिर शाम का वक्त। जब भी मुक्तिधाम में कोरोना संक्रमित लाशें पहुंच रही है। झट अपने में लग जाते हैं।

जैसे ही सिम्स या अन्य कोविड अस्पताल से एंबुलेंस मुक्तिधाम के द्वार पर पहुंचता है। बिना बुलाए मुक्तिधाम परसिर से ये मशीन की निकले हैंं। चेहरे पर मास्क और हाथों में मास्क लगाए चार युवा और एक युवा के हाथ में बड़ा सी मशीन। एंबुलेस का गेट खोलने से पहले पूरे एंबुलेंस को अच्छी तरह सैनिटाइज करते हैं। इसके बाद गेट को एक बार फिर सैनिटाइज करते हैं। इसके बाद धीरे से गेट खोलते हैं। एंबुलेंस के दाहिने तरफ बने स्टेचर स्टैंड में काले रंग के पालीथीन में कोरोना संक्रमण से मृतक का शरीर अच्छी तरह पैक करके स्टेचर में रखा दिखाई देता है।

स्टैंड से स्टेचर को आहिस्ता से उठाते हैं। इसके बाद स्टेचर सहित लाश को मुक्तिधाम के भीतर लेकर चले जाते हैंं। दाहिने तरफ बने शेड में एक जगह सम्मानपूर्वक स्टेचर को रखने के बाद अंतिम यात्रा की तैयारी में जुट जाते हैं। चिता सजाने के बाद पालीथीन से अच्छी तरह ढंके शरीर को चिता में रखते हैं। फिर चिता को पूरी तरह सजाते हैं। यहां से शुरू होता है मानवीय संवेदना का दौर। स्वजन जिनको अंतिम संस्कार की क्रिया को पूरी करनी होती है उनको लेकर आते हैं। मुखाग्नि देने में उनका सहयोग करते हैं। अपनी तरफ से संवेदना भी जताते हैं।

किट पहनने में करते हैं मदद

जिस व्यक्ति को अपने स्वजन का अंतिम संस्कार करना होता है उनको सुरक्षा किट पहनाने में मदद भी करते हैं। किट पहनाने के बाद हाथों में ग्लब्स भी पहनाते हैं। जब अंतिम संस्कार की क्रिया पूरी हो जाती है तब किट को निकालने में भी कोरोना योद्धा मदद करते हैं। किट निकालने के बाद संबंधित व्यक्ति को पूरी तरह सैनिटाइज भी करते हैं। सुरक्षा के लिए जस्र्री हिदायत भी देते हैं।

अस्थि संचय में बंटाते हैं हाथ

धार्मिक रीति रिवाज और सामाजिक बंधनों के अनुसार आमतौर पर तीसरे या फिर चौथे दिन अस्थि संचय का विधान है। कोविड श्मशान घाट में नियम कुछ अलग है। व्यवस्थागत कारणों के चलते स्वजनों को दूसरे दिन ही अस्थि संचय कराई जाती है। कोरोना योद्धा युवाओं की टीम अस्थि संचय में स्वजनों की मदद करते हैं। अस्थि संचय करने के बाद पालीथीन में पैक करने के बाद सैनिटाइज करते हैं। इसके बाद स्वजनों को सौंप देते हैं। चिता की राख को नदी में प्रवाहित करने का काम युवाओं की टीम ही करती है। खास बात ये कि इस पूरे काम मेंं ना कहीं कोई स्वार्थ और ना ही सौदेबाजी। पूरा काम जज्बा और आस्था के साथ कर रहे हैं।

एक दिन में 15 शवों को कराया अंतिम संस्कार

बुधवार का दिन संक्रमण से मौत होने वाले और स्वजनों दोनों के लिए अच्छा नहीं गुजरा। तोरवा मुक्तिधाम में युवाओं की टीम ने एक ही दिन में 15 शवों के अंतिम संस्कार में स्वजनों का मदद किया। खास बात ये कि अंतिम संस्कार के दौरान युवा ना तो चिड़चिड़ाते और ना ही किसी काम के लिए इन्कार करते हैं। बिना किसी डर और भय के अपनी जान की परवाह किए बगैर पूरे लगन के साथ लोगों के दुख में सहभागी बनते हुए काम को अंजाम दे रहे हैं।

Posted By: sandeep.yadav

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