बिलासपुर। Bilaspur News: बिजली उत्पादन भले ही विज्ञान का वरदान है ,लेकिन कोयले से निकलने वाली धुंआ और राखड़ जिन के लिए अभिशाप बन गई है, उनकी जिंदगी में रोशनी कम और अंधेरा अधिक है। कोरबा के डीएसपीएम पावर प्लांट से लगी पथर्रीपारा बस्ती के रहवासियों के लिए वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण के बीच दिन बिताना उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया है। प्रदूषण नियंत्रण नियम का पालन नहीं होने यहां के रहवासी बदहाली में जीवन बसर करने को मजबूर हैं।

प्रदूषित शहर के राष्ट्रीय मापदंड में कोरबा का नाम हमेशा आगे रहता है। इससे यहां के प्रदूषण का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। सबसे अधिक त्रासदी श्रमिक बस्तियों की है, जहां मजदूरों के पीने के लिए न तो साफ पानी है और ना ही स्वच्छ वातावरण। यही नहीं बिजली संयंत्र की कानफोडू ध्वनि 24 घंटे कान में गूंजती रहती है। घरों के छत-छप्पर से लेकर रसोई का भोजन राखड़ की धूल से अछूता नहीं है। चिमनी के धुएं से और साइलो के राखड़ से आए दिन बस्ती में धुंध छाया रहता है।

साइलो की राखड़ से निकट में बहने वाला ढेंगुर नाला का पानी दूधिया हो गया है। बिजली उत्पादन के लिए भले ही प्रदूषण को नहीं रोका जा सकता ,लेकिन मानक नियमों का पालन कर कम किया जा सकता है। पर्यावरण प्रदूषण अधिनियम पालन करने में नियंत्रण बोर्ड की ओर से जिस तरह से कोताही बरती जा रही है, उसका खामियाजा बस्ती ही नहीं बल्कि पूरे शहर वासियों को भुगतना पड़ रहा है।

अदृश्य गैसों का हो रहा स्वास्थ्य असर

प्रदूषित वातावरण का असर लगातार लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। कोयला के जलकर राख बनने की प्रक्रिया में केवल राखड़ भरी धूल का ही प्रदूषण नहीं बल्कि खदानों से निकल रही अदृश्य गैसों का भी मानव जीवन पर विपरीत असर हो रहा है। पीजी कालेज में पदस्थ रासायन विज्ञान के प्रोफेसर राजकुमार राठौर की माने तो कोयला उत्खनन के दौरान मिथेन और और कार्बन मोनो आक्साइड गैस अधिक मात्रा में निकलती है। इसी तरह कोयले को जलाने से नाइट्रोजन आक्साईड और सल्फर आक्साइड वातावरण फैलता है। ये सभी उत्सर्जन स्वच्छ पर्यावरण हानिकारक हैं।

लगातार बढ़ रही दमा पीड़ितों की संख्या

माह भर बाद ग्रीष्म ऋतु शुरू हो जाएगी। प्रदूषण का सबसे अधिक असर इसी मौसम में अधिक होता है। सायलों में डंप होने वाला राखड़ शीघ्र ही सूख जाता है। जिससे हलकी हवा से ही बस्ती में धूल का गुबार छा जाता है। रही सही कसर निकट के राखड़ डैम से पूरी हो जाती है। शहर के निकट परसाभांठा और गोढ़ी राखड़ डेम से उड़ कर आने वाली पूरे शहर को अपने गिरफ्त में ले लेता है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े के अनुसार श्रमिक बस्तियों में दमा पीड़ितों की संख्या लगातार बढ़ रही है। स्वास्थ्य सुविधा के लिए बस्ती में अस्पताल की सविधा नहीं होना भी विडंबना है।

Posted By: Yogeshwar Sharma

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