दंतेवाड़ा (नईदुनिया प्रतिनिधि)।

शारदीय नवरात्र पर सप्तमी की रात देवी का श्रृंगार कालरात्रि के रूप में होता है। सप्तमी और अष्टमी की दरम्यानी आधी रात को यहां विशेष अनुष्ठान- पूजा की जाती है। मंदिर के पुजारी और सीमित सेवादारों की मौजूदगी में कालरात्रि की पूजा होती है। इस दौरान देवी को विशेष श्रृंगार के साथ भोग और अर्पण करने की परपंरा है, जो प्रमुख पुजारी जिया परिवार के माध्यम से पूर्ण कराई जाती है। यह विधान भुवनेश्वरी (मावली) माता, जो दंतेश्वरी की छोटी बहन हैं, के मंदिर में संपन्न होता है। इस मंदिर में बने श्रीयंत्र में पुजारी पूजा विधान पूरी करते हैं। प्रमुख पुजारी हरेंद्रनाथ जिया बताते हैं कि मावली माता को कालरात्रि पूजा के दौरान 108 कमल पुष्प, 108 नग नींबू और 108 नग लौंग से तैयार हार पहनाया जाता है। साथ ही, एक बकरा और मोंगरी मछली की बलि दी जाती है। यह नितांत गोपनीय विधान है। इस दौरान बाहरी व्यक्तियों का प्रवेश निषेध होता है। बताया गया कि यह परंपरा कई पीढ़यिों से चली आ रही है। कालरात्रि पूजा विधान के बाद माताजी की अनुमति से उनके प्रतीक चिन्ह को डोली में बिठाकर बस्तर दशहरा में ले जाया जाता है।

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भैरम मंदिर में भी पूजा

कालरात्रि पूजा का एक विधान डंकनी- शंकनी नदी के पार स्थित भैरम मंदिर में भी पूरी होती है। इस विधान को भी पुजारी परिवार संपन्न कराता है। भैरम मंदिर में बकरा और मछली बलि देने की प्रथा नहीं है। यहां मुर्गें की बलि चढ़ाई जाती है। साथ ही, भैरम बाबा को महुए से तैयार शराब भी अर्पित की जाती है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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