योगेंद्र ठाकुर, दंतेवाड़ा । कोरोना वायरस को लेकर बस्तर के आदिवासी शहरी लोगों के बनिस्बत ज्यादा जागरूकता का परिचय दे रहे हैं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आदिम संस्कृति के नाम पर जिस परंपरागत आखेट (वन्यजीवों का शिकार) पर पुलिस और वन विभाग रोक नहीं लगा पाए, कोरोना के चलते वह थम गया है। सुरक्षा के चलते आदिवासियों ने खुद को घरों में कैद लिया है। इससे जंगल जाना बंद हो गया है। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने तीज-त्यौहार, मेला-मड़ई से भी तौबा कर लिया है। आदिवासी लगभग पूरे साल कोई न कोई पर्व (पंडुम) मनाते हैं। प्रकृति उनके पर्व का केंद्र बिंदु होती है। इन दिनों आमा पंडुम से लेकर आखेट और मड़ई में मस्त रहते हैं। लेकिन कोरोना ने सबकुछ बदल दिया है।

उन्होंने न केवल अपने गांवों में बाहरी लोगों का प्रवेश रोक दिया है, बल्कि खुद को घरों में कैद कर लिया है। ग्रामीणों को सामूहिक पूजा में हिस्सा लेने से मनाही है। सामूहिक आखेट पर रोक लगा दी है, जबकि इस समय वे वन्यजीवों और परिंदों का शिकार कर पर्व मनाते हैं।

केवल पूजा के लिए जरूरी सामग्री लाने और इलाज के लिए जड़ी-बूटियां जुटाने ही एक-दो ग्रामीण जंगल जा रहे हैं। बता दें कि आखेट आदिवासी संस्कृति का प्रमुख अंग है। मानसून के पूर्व चैत्र माह से यह उत्सव शुरू होता है। इसमें आदिवासियों का समूह ढोल-नगाड़ों के साथ जंगल में शिकार कर वनभोज करता है।

शादी-ब्याह भी स्थगित

कोरोना से बचने के लिए आदिवासियों ने शादीब्याह भी स्थगित कर दिए हैं। यहां तक कि नवजात की छठी और शोक के कार्यक्रमों में भी जुटने पर रोक लगा दी है। बड़ेकरका के गुड्डीराम के बेटे ईश्वर का विवाह चेरपाल के बोडाराम अटामी की बेटी बुधरी से 26 मार्च को होना था। निमंत्रण पत्र भी तैयार हो गया था। लेकिन इसे स्थगित कर दिया है। ग्राम गढ़मरी में छठी का कार्यक्रम था। इसमें भी सभी को आने से रोक दिया गया।

आदिवासी युवा कर रहे हैं जागरूक

अल्पशिक्षा के बावजूद बस्तरियों में गजब की जागरूकता देखने को मिल रही है। आदिवासी युवाओं की टोली शारीरिक दूरी का पालन करते हुए ग्रामीणों को जागरूक कर रही है। बड़ेकरका निवासी बल्लू भोगामी और सुरेश कर्मा ने बताया कि कोरोना वायरस के बारे में जितना जाना है, उसके मुताबिक इसके संक्रमण से बचने के लिए सभी को एक-दूसरे से कम से कम डेढ़ मीटर दूर रहना है। घरों से बाहर नहीं निकलना है।

यह जानकारी घूम-घूमकर देते हैं। इस दौरान उनकी टीम खुद शारीरिक दूरी का पालन करती है। उन्होंने बताया कि सारे पंडुम रोक दिए हैं। बहुत जरूरी होने पर गायता-वड्डे (पुजारी) अकेले ही देवगुड़ी (देवी-देवता का निवास) में पूजा संपन्न् कर रहे हैं। वहां किसी भी ग्रामीण को जाने की इजाजत नहीं है।

Posted By: Sandeep Chourey

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