दंतेवाड़ा। नईदुनिया प्रतिनिधि

बस्तर दशहरा से लौटी माईजी की डोली ने आंवराभाटा में रात्रि विश्राम के बाद रविवार देर शाम मंदिर प्रवेश किया। इससे पहले माईजी की डोली कोतवाली के सामने बोधराज बाबा और घाटभैरव पहुंची। पुजारियों ने माईजी की ओर से बोधराज बाबा को सफेद मुर्गी भेंट किया। परपंरानुसार बस्तर दशहरा में जाने से पूर्व और वापसी में मंदिर प्रवेश से पूर्व माईजी बोधराज बाबा से अनुमति लेती हैं। शनिवार रात को जगदलपुर से लौटी डोली और छत्र देर रात आंवराभाटा पहुंची। जहां उनका विश्राम हुआ। सुबह श्रद्धालुओं ने डोली के दर्शन और पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लिया।

नवरात्र की अष्टमी को विशेष पूजा के बाद मावली माता की डोली और छत्र बस्तर दशहरा में शामिल होने गई थी। जहां भीतर रैनी-बाहर रैनी व दीगर रस्मों में शामिल होकर दंतेश्वरी मंदिर ठहरी रही। दशहरा में शामिल देवी-देवताओं की विदाई के बाद शनिवार की सुबह जगदलपुर दंतेश्वरी मंदिर प्रांगण से डोली की विदाई हुई। डोली और छत्र रास्ते में आधा दर्जन से अधिक जगह ठहरते शनिवार की देर रात आंवराभाटा पहुंच रात्रि विश्राम किया। रविवार की सुबह आंवराभाटा में श्रद्धालुओं ने दिन भर डोली के दर्शन कर आशीर्वाद लिया। देर शाम गाजे-बाजे और आतिशबाजी के बीच डोली और छत्र को लेकर श्रद्धालु मंदिर के लिए रवाना हुए। इस दौरान एसपी आफिस, डंकनी पुल के पास और गायत्री मंदिर के सामने लोगों ने पूजा-अर्चना किया। कथा है कि वारंगल से आने के बाद डंकनी-शंकनी में मंदिर बनाने बाबा बोधराज ने माईजी को जगह दी थी। इसलिए माईजी की डोली बस्तर दशहरा में जाने से पूर्व और आने के बाद यहां विशेष पूजा की प्रथा है। दंतेवाड़ा बस्ती और आसपास के कुछ इलाके बाबा बोधराज की जमीन कहलाती है।

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Posted By: Nai Dunia News Network