योगेंद्र ठाकुर, दंतेवाड़ा। बैलाडिला के पहाड़ी पर समुद्र तल से तीन हजार फीट की ऊंचाई पर गोल- मटोल गणेशजी की प्रतिमा स्‍थापित है। जहां साल भर श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। यहां की गणेश प्रतिमा की ढोलक की तरह गोलमटोल है। इसलिए पहाड़ी को ढोलकल कहा जाता है।

ललितासन्‍न में विराजे गणपति के दात भी टूटे हैं। पौराणिक कथाओं में भगवान गणेश और परशुराम के बीच इसी पहाड़ी पर युद्ध हुआ था। तब गणेश के एक दांत टूआ और वे एकदंत कहलाए। परशुराम के फरसा भी इस पहाड़ी पर कई जगह टकराने से यहां के पत्‍थर में उच्‍च क्‍वालिटी का लोहा पाया जाता है। जबकि इस फरसा की वजह से पहाड़ी के बसे गांव को फरसपाल कहा जाता है।

गणेश चतुर्थी पर पूरे देश और विदेशों में गणेशजी की पूजा के साथ पंडालों में स्‍थापना की जाती है। लेकिन दंतेवाड़ा जिला मुख्‍यालय से करीब 22 किमी दूर ढोलकल पहाड़ी में बारह महीने ग्रामीण गणेशजी की पूजा करते हैं।

समुद्र तल से 2994 फीट ऊंचाई की पहाड़ी की चोटी पर ग्रेनाइट पत्‍थर से निर्मित ललितासन्‍न वाले करीब 100 किलोग्राम वजनी गणेशजी विराजे हैं। इतनी ऊंचाई पर प्रतिमा कौन ले गया, यह कोई नहीं जानता। लेकिन पहाड़ी के नीचे बसे आदिवासी समुदाय भोगामी परिवार के द्वारा यहां पीढ़ियों से पूजा- अर्चना किए जाने की बात लोग कहते हैं।

दंतकथाओं में ढोलकल और बैलाडिला की कहानी

एक दंतकथा के अनुसार भगवान गणेश और परसुराम के बीच युद्ध भी इसी पहाड़ पर हुआ था। युद्ध के दौरान परशुराम के वार से गणेश का एक दांत इसी पहाड़ी पर टूटा और वे एकदंत कहलाए। कहा जाता है कि परशुराम के फरसा की वजह से पहाडी के नीचे बसे गांव को फरसपाल हुआ और पहाड़ी के करीब बस्‍ती को कोटवार (रक्षक) पारा कहा जाता है। यहां के लोग गणेशजी को अपना रक्षक भी मानते हैं।

इसी कथा से जुड़ी एक और कहानी बैलाडिला के पहाड़ से संबंद्ध रखती है। कहानी के अनुसार गणेशजी से युद्ध के दौरान परशुराम का फरसा कई बार चट्टानों से टकराया। इसकी वजह से बैलाडिला का पहाड़ लोहे का बन गया और यहां पर उच्‍च क्‍वालिटी का लोहा पाया जाता है।

ढाई साल पहले गिरा दी गई थी प्रतिमा

करीब ढाई साल पहले ढोलकल के गणेशजी की प्रतिमा हो अज्ञात लोगों ने नीचे गिरा दिया था। चट्टान से गिरने से प्रतिमा के 55 से अधिक टुकड़े हो गए थे। जिसे ड्रोन कैमरे से खोजा गया और आर्कियोलॉजी विभाग के सहयोग से जोड़कर पुन: उसी जगह स्‍थापित किया गया है। अब शासन और ग्रामीणों के सहयोग से फरवरी माह में यहां मेला भी लगने लगा है।