दंतेवाड़ा। नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले में अब रेशम की डोर से आदिवासी खुशियों का ठिकाना खोज रहे हैं। जिले के गंजेनार इलाके में 45 किसानों ने मिलकर करीब 50 एकड़ की जमीन पर रेशम (कोसा) पालन शुरू किया है। मेहनत का फल अब पेड़ों पर नजर आ रहा है। शीघ्र ही इन्हें बाजार में बेचकर ग्रामीण जिंदगी का ताना- बाना बुनेंगे। जिला प्रशासन की पहल पर एग्रीकल्चर और रेशम विभाग ने गंजेनार इलाके में किसानों की करीब 50 एकड़ जमीन पर उगे सेना, आदन और अर्जुन के पेड़ों पर रैली कोसा के ककून छोड़े थे, जिसकी देखभाल गांव के करीब 45 किसान और उनका परिवार कर रहे हैं।

करीब एक माह पहले किसानों ने विभाग से इल्लियां पेड़ों पर छोड़ा था। अब इल्लियों ने वयस्क होकर कोसा निर्माण शुरू कर दिया है। एक पेड़ में पांच से 15 कोसा फल तैयार हो गए हैं। इनमें कुछ परिपक्व हो गए हैं, जिन्हें अधिकारियों की निगरानी में शीघ्र निकाला जाएगा। यहां कोसा उत्पादन की भरपूर संभावना है।

एक साल में तीन बार कोसा की फसल ली जा सकती है। बस्तर का कोसा देश दुनिया में प्रसिद्ध है। यहां कोकून से एक किमी तक की लंबाई का रेशम धागा निकाला जा चुका है। इस पर शोध भी चल रहा है।

बाजार में पांच से सात रुपए में मिलता है एक कोसा

ग्रामीणों ने बताया कि बाजार में साबूत एक कोसा की दर पांच से सात रूपये होती है। हम चाहते हैं कि इसे सरकार खरीदे। युवा ग्रामीण लालू ताती ने कहा कि इल्लियों को पक्षियों से खतरा है। कौंआ और दीगर परिंदों के लिए कोसा के इल्ली पसंदीदा कीट हैं। ऐसे में गांव के आधे युवक दिन में पक्षियों को भगाने का काम करते हैं। इसके लिए टीन के पीपे को पीटकर शोर करना पड़ता है।

एक लाख कोसा फल मिलेगा

कृषि विभाग के अधिकारी नेहरू मरकाम ने बताया कि किसानों की रूचि को देखते यहां रैली कोसा उत्पादन के साथ करीब 150 एकड़ जमीन में रमतिल, कोसरा, मूंग की फसल लेने किसानों को प्रेशर किया है। किसान काफी उत्साहित हैं। अभी दलहन- तिलहन का फसल तैयार नहीं हुआ है लेकिन कोसा फल आने लगे हैं। इससे किसान काफी उत्साहित हैं।

कम लागत में ज्यादा मुनाफा का यह व्यवसाय है। मरकाम के मुताबिक 50 एकड़ में लगे पेड़ों पर करीब एक लाख इल्लियां (डीएफएल) छोड़ी गई थीं। इससे करीब तीन लाख कोसा फल मिलने की उम्मीद है लेकिन तेज बारिश और परिंदों से कुछ इल्लियां खराब हो गई।

बावजूद अभी एक लाख कोसा फल का उत्पादन होगा। कम समय में अच्छी आय किसान बलराम कश्यप के लिए यह नया प्रयोग काफी उत्साहित करने वाला है। बलराम कहता है कि खेतीकिसानी के अलावा इस व्यवसाय को किया जा सकता है। हम लोगों ने धान बोआई के बाद सितंबर महीने में इल्लियां पेड़ों पर छोड़ा था। एक महीना में ही इल्ली बड़े होने के बाद कोसा निर्माण कर रहे हैं। कम समय अच्छा आय मिलेगा।

Posted By: Sandeep Chourey