नगरी (नईदुनिया न्यूज)।

पौराणिक मान्यताओं के अनुरूप नगरी-सिहावा अंचल के अधिकांश गावों में हरेली त्योहार के बाद रविवार के दिन इतवारी त्योहार मनाने की परंपरा कायम है। इस दिन किसान कृषि कार्य बंदकर गांव में खुशहाली और हरियाली के लिए पूजा पाठ कर अपने खेतों में चीला रोटी का प्रसाद चढ़ाते हैं।

वही एक निर्धारित समय में गांव के लोग इकट्ठा होकर कृषि संबंधी व् गांव के अन्य समस्याओं को सुलझाने के लिए नीति गत फैसले लेते हैं, लेकिन इस वर्ष कोरोना महामारी के चलते लोग इतवार के दिन एक साथ नही बैठ पाये। सिहावा अंचल के ग्राम उमरगांव,घटुला, रानीगांव, सांकरा,पोङागांव, लखनपुरी,मौहाबाहरा सहित विभिन्ना गावों में इतवारी व कुछ गावों में बुधवारी त्योहार मनाया गया। ग्राम सुरक्षा समिति अध्यक्ष कृष्णा मारकोले, लिलम्बर शेष ग्राम पटेल,महेश अग्रवाल, अंगेश हिरवानी, देवेन्द्र सेन, विष्णु शेष, जनक साहू, सुरेश शीतला पुजारी,कृष्णा झांकर,शोभित नेताम, भगवान कुंजाम, नकुल सूर्यवंशी, मेघराज ध्रुव, छगन साहू, हेमन्त पुजारी, प्रेमलाल साहू, तुलेंद्र साहू, पोखराज साहू, फलेंद्र साहू,राज कुमार वैष्णव आदि लोगों का कहना है कि सावन माह में चलने वाले इस त्योहार को मनाने की परंपरा सैकड़ों वर्ष पुरानी है। इस त्योहार को लगातार तीन या चार सप्ताह मनाया जाता है। त्यौहार का समापन अंतिम सप्ताह को गांव के प्रमुख इष्ट देवी देवता के स्थान पर लोग एकत्र होकर गांव के झाकर पुजारी के द्वारा विशेष रूप से विधिवत पूजा पाठ कर किया जाता है। बड़े बजुर्गो द्वारा अपने अपने गांव की परंपरा के अनुरूप किसान आज भी अपने कुल देवता एवं देवी लक्ष्‌मी का पूजा अर्चना करते हैं। प्रसाद में विशेष रूप से चीला रोटी चढ़ाते है। ग्रामीणों का मानना है कि ऐसा करने से गांव में शांति, सुख समृद्धि और खुशहाली बना रहता है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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