नगरी-बेलरगांव (नईदुनिया न्यूज)। वैसे तो छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की तरक्की और वनवासी इलाकों की तस्वीर संवारने सरकार तमाम तरह की योजनाएं बनाती है और इसके लिए बाकायदा करोड़ों रुपये की मंजूरी भी दी जाती है, लेकिन जब बात जमीनी हकीकत की हो तो सारे दावे महज कागजी साबित होते नजर आते हैं। नगरी ब्लॉक से 30 किमी दूर कट्टी गांव बुनियादी जरुरतों के लिए तरस रहा है। यहां आवागमन के लिए न तो अच्छी सड़क है और न ही स्वास्थ्य की सुविधा। गांव वालों ने बताया कि उनकी जिंदगी खतरों और तकलीफों से जूझ रही है। प्रशासन इस ओर ध्यान नहीं दे रहा।

नगरी ब्लाक से 30 किमी दूर ग्राम पंचायत कट्टी गांव और उसका आश्रित गांव सिंगनपुर है। यहां के लोग बुनियादी सुविधाओ से आज भी कोसों दूर है। यहां न तो स्वास्थ की सुविधा है न आवागमन का साधन है। न ही राशन दुकान है। राशन के लिए ग्रामीणों को पांच किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय कर बरोली गांव जाना पड़ता है। इस इलाके के आदिवासी परिवारों के दिन हालात से समझौता करते कट रहा है। आलम ये है कि गांव में न अस्पताल है और न ही आवागमन का कोई साधन है। ग्रामीणों की माने तो बरसात के दिनों में यहां भयावह स्थिति निर्मित हो जाती है। दूरस्थ गांवों में जाने के लिए नदी पार कर जाना पड़ता है। इस बीच कई बार जान जोखिम में पड़ने की नौबत भी आ जाती है। गांव वालों की कोई नहीं सुन रहा। इधर पीडीएस सिस्टम के जरिए सरकार वाहवाही जरूर लूटती रही है। राशन के लिए गांव वालों को राशन दुकानों में जाना ही पड़ता है। या फिर अन्य जरूरतों के लिए जान जोखिम मे डालकर नदी पार करना पड़ता है। एक तरफ जहां बीहड़ में रहने वाले आदिवासी सहूलियतों को तरस रहे हैं वहीं 70 किमी दूर जिला मुख्यालय में बैठे सरकारी अफसरों को इसका अंदाजा तक नहीं है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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