कुणाल दत्त मिश्रा/ बिसेशर हिरवानी, राजिम। छत्तीसगढ़ के त्रिवेणी संगम राजिम में इस साल 19 फरवरी को माघ पूर्णिमा पर वृहद मेला भरने जा रहा है। भाजपा के शासनकाल में इसे राजिम कुंभ का नाम दिया गया था। इसकी ख्याति दूर-दूर तक फैले इसके लिए देशभर के साधु-संतों को यहां आमंत्रित किया जाता रहा। कांग्रेस सरकार ने इसका नाम बदलकर माघी पुन्नी मेला कर दिया है। लेकिन श्रद्धालुओं को इससे क्या, वे तो मेले का आनंद लेने के साथ ही नदी में पुण्य स्थान कर जीवन सार्थक करने जरूर पहुंचेंगे। यह मेला चार मार्च तक चलेगा। शासन-प्रशासन इस वृहद आयोजन को सफल बनाने के लिए जुटा हुआ है।

राजिम में सरकारी आयोजन वर्ष 2001 से राजीव लोचन महोत्सव के नाम से शुरू हुआ था, जिसे भाजपा सरकार ने वर्ष 2005 में राजिम कुंभ का नाम दे दिया था। वर्ष 2006 से 2018 तक राजिम में 'कुंभ" के नाम से मेला भरा। इन 13 वर्षों में राजिम कल्प कुंभ मेला की भव्यता लगातार बढ़ी। बीते वर्ष कई बड़े आयोजनों ने इसकी पहचान देश-विदेश तक फैला दी।

ढाई लाख दीपों से जगमगाया था राजिम

राजिम कुंभ के 13वें वर्ष में ढाई लाख दीपों को एक साथ प्रज्जवलित कर मेले में पहुंचने वाले साधु-संतों का स्वागत किया गया था। ढाई लाख दीपों से राजिम जगमगा उठा था। वहीं नदी कि किनारे मैराथन दौड़ में बढ़-चढ़कर भागीदारी की गई थी। पंद्रह सौ शंखों का एक स्वर में शंखनाद किया गया था।

राजिम कुंभ में नागा संत संन्यासियों को हमेशा बुलाया जाता रहा है। वे अपने ईष्ट दत्तात्रेय भगवान का पूजा-आरती कर अपनी धर्म ध्वजा की स्थापना करते रहे। दशनाम नागा संन्यासी के धर्म ध्वजारोहण अनुष्ठान को लेकर नागाओं ने गजब का उत्साह देखा जाता है।

नदी में बन रही रेत की सड़क

राजिम पुन्नी मेला को तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। नदी के अंदर पहले मुरुम की सड़क बनती थी, जिसमें लोग आसानी से इस पार से उस पार पूरे तक नदी का भ्रमण बाइक व अन्य वाहन से कर लेते थे। लेकिन इस बार रेत की सड़क बन रही है। रेत के दोनों तरफ सीमेंट की बोरियों में रेत भरकर डाल जा रहा है।

पूरी तरह से रेत ही रेत बिछाई गई है। इससे श्रद्धालु पैदल ही आना-जाना कर सकते हैं। नवागांव एनीकट जो कुलेश्वरनाथ मंदिर से एक किलोमीटर की दूरी पर है, वहां पानी इकठ्ठा किया जा रहा है ताकि माघी पुन्नी के समय लोगों को डुबकी लगाने में किसी प्रकार की असुविधा न हो।

मेला मैदान में दो मीना बाजार आ चुके हैं। क्राफ्ट बाजार, मौत का कुआं, झूला, डिस्को झूला सहित अनेक दुकानें लगनी शुरू हो गई हैं। बताया जा रहा है कि इस बार सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए तीन मंच रखे जाएंगे। साधु-संतों का प्रवचन भी होगा।

इन संतों और अखाड़ा प्रमुखों ने की शिरकत

जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठाध्ाीश्वर, आचार्य महामंडेश्वर विशोकानंद जी महाराज, राष्ट्रीय संत असंग साहेब जी, महामंडेश्वर प्रेमानंद जी महाराज, संत ज्ञानस्वरूपानंद अक्रिय जी महाराज, दंडी स्वामी सच्चिदानंद, अग्नि पीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर ब्रम्हऋषि रामकृष्णानंद जी महाराज अमरकंटक, महामंडलेश्वर प्रेमानंद, आचार्य महंत जालेश्वर महाराज, महंत साध्वी प्रज्ञा भारती, बालयोगेश्वर रामबालकदास महाराज, संतश्री ज्ञानस्वरूपानंद महाराज, ब्रम्हचारी इंदूभवानंद महाराज, संत युधिष्ठिरलाल महाराज, महामंडलेश्वर गोवर्धन शरण जी, महामंडलेश्वर बनवारीपुरी जी महाराज, दिगंबर जनकपुरी जी महाराज, थानापति राजेन्द्र पुरी, महेन्द्रगिरी जी, आनंदगिरी, भागीरथी, सनतपुरी, रामूमूर्ति थानापति, रामेश्वर गिरी, चंदाभारती, महादेवजति, दयानंद गिरी, संजय भारती, राजूपुरी, साध्वी सिद्धेश्वरीपुरी, माता उमा भारती, चंदापुरी भाई, आकाश पुरी महाराज, नरेंद्रपुरी महाराज, संजय भारती महाराज, गोपाल भारती महाराज, राजेन्द्र गिरी, सनतपुरी, विजयपुरी महाराज, गजेन्द्र गिरी, मुकेश गिरी महाराज, रूद्रगिरी महाराज, प्रेम गिरी महाराज, नारायणपुरी महाराज, गोपाल गिरी सहित बड़ी संख्या में नागा संत संन्यासी मौजूद थे। स्वामी अखिलेष जी, स्वामी गिरीश जी, महामेरुचक्र पीठाधीश्वर सच्चिदानन्द दण्डी जी महाराज, ब्रम्हकुमार नारायण भाई, ब्रम्ह कुमारी पुष्पा बहनजी सहित संत यहां पधार चुके हैं।

विदेशी सैलानी भी पहुंचते हैं

राजिम में प्रतिवर्ष विदेशी सैलानी भी पहुंचते हैं। बीते कई वर्षों से यह सिलसिला चल रहा है। नौ फरवरी 2018 को ग्रेट ब्रिटेन यूके के वेल्स एबरगेवन्नी से राजिम पहुंचीं। केरलीना एबरगेवनी यूके ने चर्चा के दौरान बताया था कि उनका खुद का स्कूल है। वे यहां पहले भी आ चुकी हैं। इस बार काफी कुछ नया देखने को मिला। उन्होंने बताया कि राजिम कुंभ मेले के इस आयोजन में छत्तीसगढ़ समेत कई अन्य पड़ोसी राज्यों से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

एक नजर में

- छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के राजिम में लगता है यह भव्य धार्मिक मेला।

- राजिम मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। यह महानदी के तट पर बसा है।

- राजिम नगरी राजधानी रायपुर से 45 किलोमीटर दूर सोंढूर, पैरी और 'महानदी' के त्रिवेणी संगम-तट पर है।

- तीनों नदियों के संगम पर हर वर्ष न जाने कब से आसपास के लोग आते हैं।

- इस नगरी को धार्मिक कार्यों के लिए उतना ही पवित्र मानते हैं, जितना कि अयोध्या और बनारस को।

- मान्यता है कि जगन्नाथपुरी की यात्रा तब तक संपूर्ण नहीं होती, जब तक यात्री राजिम की यात्रा नहीं कर लेता।

- छत्तीसगढ़ी भाषा में पूर्णिमा को छत्तीसगढ़ी में 'पुन्नी कहते हैं। कुंभ माघी पुन्नी मेला के रूप में मनाया जाता रहा।

- अब इसे राजिम माघी पुन्नी मेला के नाम से जाना जाएगा।

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